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Rewa MP: खरी खरी पर सही-सही, अजब मऊगंज, में गजब कारनामा ,,

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🕒 Updated: 05 Feb 2026, 05:05 AM

Rewa MP: खरी खरी पर सही-सही, अजब मऊगंज, में गजब कारनामा,,

वर्तमान समय में मध्यप्रदेश की मऊगंज की पावन धरा पर जो दृश्य उभर रहा है, वह न सिर्फ़ विचलित करने वाला है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है। कभी शांति और सौहार्द के लिए पहचाना जाने वाला यह इलाका आज राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक सख़्ती और जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति के कारण चर्चाओं के केंद्र में है।

सबसे पहले बात उस प्रतिनिधित्व की, जिसके भरोसे जनता ने अपना भविष्य सौंपा था। चुने हुए विधायक का क्षेत्र से लापता होना और यह कहना कि उनकी जान को ख़तरा है—अपने आप में एक असहज स्थिति है। उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि न तो सरकार और न ही संगठन से उन्हें कोई ठोस संबल मिलता दिख रहा है। हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में विधायक द्वारा राजनीति से मन उचटने की बात कहना, उसके बाद अब मानो सत्ता और संगठन के भीतर नए समीकरण बनाए जा रहे हैं।

लोगों का कहना है की भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में अब पर्दे के पीछे से नई राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है—चाय की टपरी से लेकर पान की गुमटी तक एक ही सवाल गूंज रहा है: “प्रदीप पटेल नहीं तो फिर कौन?”
कयासों का बाज़ार गर्म है। कोई जिलाध्यक्ष की दावेदारी की बात कर रहा है, तो कोई पुराने-नए चेहरों की वापसी की। उसमें से भाजपा जिलाध्यक्ष और बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड चुके वर्तमान भाजपा नेता मृगेंद्र सिंह का नाम प्रमुखता से लेते हुए सुना और देखा गया है,,
वहीं बात की जाए मऊगंज के पूर्व विधायक रहे लक्ष्मण तिवारी जो वर्तमान में कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं लेकिन जिस तरह से कांग्रेस पार्टी को लेकर दिए गए हालिया बयान पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध किया उसको देखते हुए यह भी तय माना जा रहा है की लक्ष्मण तिवारी पूरी तरह से चुनावी मोड पर आ चुके हैं चाहे कोई पार्टी टिकट दे या ना दे चुनाव लडना लगभग तय माना जा रहा है!

मऊगंज से पूर्व विधायक सुखेन्द्र सिंह बन्ना एक जमीनी नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं उनका भी चुनाव लडना लगभग 101% तय माना जा रहा है उसके पीछे का एक कारण यह भी है की भले ही सुखेंद्र सिंह बन्ना लगातार दो चुनाव हार चुके हैं उसके बाबजूद कांग्रेस पार्टी में सुखेंद्र सिंह बन्ना के अलावा कोई दुसरा मजबूत और शसक्त उम्मीदवार नजर नहीं आ रहा है!

वैसे वर्तमान जिलाध्यक्ष हरीलाल कोल भी काफी सक्रिय दिख रहे हैं तेज तर्रार नेता भी हैं बीते दो दिन पहले हनुमना तहसील में कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन में जिस तरह का ओजस्वी भाषण वर्तमान जिलाध्यक्ष हरीलाल के द्वारा दिया गया जोरदार भाषण चर्चा में है और जिस तरह से सोशल मीडिया में उनका विडियो वायरल हुआ उसको लेकर अब धीरे-धीरे ही सही हरीलाल के प्रति कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मंशा बदलने लगी है कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी पिछड़े लोगों को आगे की पंक्ति में लाकर खड़ा करने के सिद्धांत में काम कर रहा है उसको देखते हुए कांग्रेस पार्टी से हरीलाल आदिवासी की भी दावेदारी तो बनती है!

लोगो का मानना है की आम आदमी पार्टी से पंडित उमेश त्रिपाठी का चुनाव लडना तय है इन सबके नाम हवा में हैं, और सबके समर्थक मैदान में उतरने की तैयारी का दावा कर रहे हैं। लोकतंत्र में चुनावी प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन जब पूरी चर्चा केवल टिकट और सत्ता तक सिमट जाए, और जनता के मुद्दे पीछे छूट जाएँ, तो चिंता स्वाभाविक है।

जिला की प्रशासनिक भूमिका पर भी उठें सवाल ❓

अब प्रशासन की भूमिका पर नज़र डालें। जिस तरह से विधायक के लापता होने की सूचना के बाद भी प्रशासन का ढुलमुल रवैया देखने को मिला इसकी अपेक्षा जिला की आमजनता कभी नहीं की थी! उसके साथ ही  समाजसेवियों और आंदोलनकारियों पर एक के बाद एक कार्रवाइयाँ हुई हैं, उसने प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। कलेक्टर कार्यालय से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप, आंदोलन, धारा 163, और फिर आंदोलनकारियों को जेल की सलाखों के पीछे धकेलना उसके बाबजूद अनशन का समाप्त ना होना उसके बाद मजबूरी में ही सही अनशनकारियों की मांग के आगे प्रशासन का झुकना और फिर
अंततः दबाव में लिया गया निर्णय—ये सभी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि प्रशासन और जनता के बीच विश्वास की खाई गहरी हो चुकी है। और अब वर्तमान समय में प्रशासन का जिस तरह से रवैया अपनाएं हए है वह अब सवाल उठाता है कि क्या खोई हुई साख को वापस पाने के लिए कानून और पद का दुरुपयोग किया जा रहा है?
मऊगंज के जिला बनने से पहले इसे एक शांत क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि यह जिला बार-बार प्रदेश और देश की सुर्खियों में किसी न किसी विवाद के कारण आ रहा है। आमजन और विधि के जानकार इसे “अंग्रेज़ी हुकूमत” की पुनरावृत्ति कहने लगे हैं—जहाँ सत्ता का केंद्र जनता नहीं, बल्कि आदेश और दमन बनता जा रहा है। और इन सबके बाबजूद जिला में विधायकी के इतने सारे दावेदारो के चुप रहना भी कही ना कही या तो अन्याय भ्रष्टाचार और आरजकता पर चुप रहकर मौन सहमति दर्शाती है या फिर,,

किसी ने ठीक ही कहा था ,,
“जब नोचा-नोची मची हुई है, तो तुम भी जमकर नोचो ना…
“सब अपनी-अपनी सोच रहे हैं, तुम भी अपनी सोचो ना…

आमजन की मानें तो वर्तमान समय में मऊगंज जिला में यही सबकुछ चल रहा है! लेकिन लोकतंत्र का तकाज़ा इससे कहीं बड़ा है। आज विधायक क्षेत्र से गायब हैं, जनता परेशान है, प्रशासन बेलगाम प्रतीत होता है। विकास कार्य ठप हैं, योजनाएँ काग़ज़ों में सिमट गई हैं, सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए लोग भटक रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है—फाइलें गुम हो जाती हैं और फैसले “लिफ़ाफ़े के वज़न” से तौले जाते हैं।
जनता सड़क पर है, नारे लगा रही है, विपक्ष के साथ खड़ी है—फिर भी सुनवाई नहीं। ऐसे में एक कवि की पंक्ति बरबस याद आती है—

कि इया देखि आबा एक ख्याल , का होई मऊगंज के हाल,,

यह पंक्ति आज मऊगंज की सामूहिक पीड़ा बन चुकी है। सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि अगला विधायक कौन होगा, बल्कि यह है कि मऊगंज का भविष्य किस दिशा में जाएगा। क्या यह जिला फिर से शांति, विकास और विश्वास की राह पकड़ेगा, या यूँ ही राजनीतिक स्वार्थों और प्रशासनिक टकरावों में उलझा रहेगा?
यह समय आत्ममंथन का है—नेताओं के लिए भी और प्रशासन के लिए भी। क्योंकि अगर जनता का भरोसा टूट गया, तो सत्ता और पद दोनों ही खोखले साबित होंगे। मऊगंज को “अजब-गजब” नहीं, बल्कि स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध जिला बनने की ज़रूरत है।

लेखक – मिथिलेश त्रिपाठी पत्रकार जिला – मऊगंज मध्यप्रदेश
मो,  9039427560

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