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Mauganj MP:रीवा-मऊगंज में अन्नदाता की पीड़ा: फसल उगाने वाला किसान ही दाम तय करने में क्यों मजबूर?

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🕒 Updated: 17 Oct 2026, 07:16 AM

Mauganj MP:रीवा-मऊगंज में अन्नदाता की पीड़ा: फसल उगाने वाला किसान ही दाम तय करने में क्यों मजबूर?

 

 

 

 

रात-रात भर आवारा पशुओं से फसल की रखवाली, महंगी खेती और बढ़ती लागत के बीच किसानों का सवाल—जब हर कारोबार में लागत के हिसाब से कीमत तय होती है, तो किसान की फसल का उचित मूल्य कौन तय करेगा?

रीवा/मऊगंज। खेतों में दिन-रात मेहनत, बढ़ती लागत, मौसम की मार और आवारा पशुओं से फसल बचाने की जद्दोजहद… इन सबके बीच किसान जब अपनी फसल तैयार करता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—उसकी मेहनत की कीमत आखिर तय कौन करेगा?

रीवा और मऊगंज क्षेत्र के किसानों के बीच अब यह सवाल चर्चा का विषय बनता जा रहा है कि जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और बाजार में रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुओं के दाम बढ़ते जा रहे हैं, तो किसान को उसकी उपज का ऐसा मूल्य क्यों नहीं मिलता, जिससे उसकी लागत, मेहनत और जोखिम का उचित प्रतिफल मिल सके?

 

 

 

 

‘सुई बनाने वाला अपना दाम तय करता है, किसान क्यों नहीं?’

एक किसान ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए सवाल उठाया कि उद्योग और व्यापार से जुड़े लोग अपने उत्पाद की कीमत तय करते समय लागत, श्रम और बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हैं। ऐसे में खेत में महीनों मेहनत करके अनाज पैदा करने वाले किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए दूसरों पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है?

किसान का कहना है कि वह बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, सिंचाई और मजदूरी पर खर्च करता है। इसके अलावा मौसम की अनिश्चितता और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले आवारा पशुओं से बचाने के लिए कई बार रात-रात भर खेतों में पहरा देना पड़ता है।

इसके बावजूद फसल तैयार होने के बाद किसान बाजार में अपनी उपज की कीमत तय करने की स्थिति में खुद को सक्षम नहीं पाता।

 

 

 

 

महंगाई बढ़ी, खेती की लागत बढ़ी तो उपज का उचित मूल्य भी बढ़ना चाहिए

किसानों का कहना है कि खेती अब पहले जैसी आसान नहीं रही। कृषि से जुड़ी लागत लगातार बढ़ने के कारण फसल तैयार करने में पहले की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ता है।

किसानों की मांग है कि उपज का मूल्य निर्धारित करते समय केवल बाजार की कीमत नहीं, बल्कि किसान की वास्तविक लागत, परिवार की मेहनत, जोखिम और खेती में लगी पूंजी को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

उनका कहना है कि यदि खेती आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं होगी तो आने वाली पीढ़ियां खेती से दूर हो सकती हैं।

 

 

 

 

आवारा पशु भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती

रीवा-मऊगंज क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आवारा पशुओं से फसल बचाना भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। किसान बताते हैं कि खेतों में खड़ी फसल को बचाने के लिए उन्हें रात में भी खेतों की निगरानी करनी पड़ती है।

एक तरफ फसल की लागत बढ़ती है और दूसरी तरफ नुकसान का खतरा बना रहता है। ऐसे में किसान चाहता है कि उसकी मेहनत और जोखिम का भी मूल्यांकन कृषि नीति और फसल मूल्य निर्धारण में किया जाए।

 

 

 

 

कर्ज का दबाव और खेती के भविष्य पर सवाल

किसानों का कहना है कि जब फसल की कीमत उनकी लागत और मेहनत के अनुरूप नहीं मिलती, तो आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है। कई किसान खेती के लिए कर्ज लेते हैं और फसल पर उनकी पूरी आर्थिक निर्भरता होती है।

किसानों की मांग है कि सरकार ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे, जिसमें उन्हें अपनी उपज का लाभकारी और पारदर्शी मूल्य मिल सके तथा खेती घाटे का सौदा न बने।

 

 

 

 

अन्नदाता का सीधा सवाल—मेहनत हमारी, जोखिम हमारा, फिर कीमत तय करने में हमारी भूमिका क्यों नहीं?

किसानों की यह पीड़ा केवल किसी एक फसल या एक गांव तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक सवाल से जुड़ी है कि जिस किसान की मेहनत से समाज का पेट भरता है, उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

किसान चाहता है कि घोषणाओं और वादों के साथ-साथ जमीन पर ऐसी व्यवस्था दिखाई दे, जिससे उसे उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, खेती की लागत का वास्तविक आकलन हो और फसल को नुकसान से बचाने के ठोस इंतजाम किए जाएं।

 

 

अन्नदाता का सवाल साफ है—अगर हर उत्पाद की कीमत उसकी लागत और बाजार के हिसाब से तय होती है, तो किसान की मेहनत और जोखिम का उचित मूल्य सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

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