JBP MP:महिला अधिवक्ता के यौन शोषण और धर्मांतरण के आरोपों में घिरे सीनियर एडवोकेट को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत!
जस्टिस देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने कहा- प्रथम दृष्टया आपसी सहमति का मामला, शपथ पत्र और लिव-इन एग्रीमेंट को माना महत्वपूर्ण
छतरपुर। महिला अधिवक्ता के यौन शोषण, शादी का झांसा देने, वीडियो के जरिए ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े मामले में छतरपुर के सीनियर एडवोकेट इम्तियाज अहमद सिद्दीकी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिली है। जस्टिस देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद प्रथम दृष्टया इसे आपसी सहमति से जुड़ा मामला माना और आरोपी को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
हालांकि, अदालत ने आरोपी को जांच में सहयोग करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट की टिप्पणी उपलब्ध रिकॉर्ड और इस चरण पर सामने आए तथ्यों के प्रथम दृष्टया आकलन पर आधारित है।
महिला अधिवक्ता ने लगाए गंभीर आरोप
मामला छतरपुर की 32 वर्षीय महिला अधिवक्ता की शिकायत से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र से आकर छतरपुर में वकालत कर रही महिला का संपर्क वर्ष 2024 में 50 वर्षीय सीनियर एडवोकेट इम्तियाज अहमद सिद्दीकी से हुआ था।
महिला का आरोप है कि आरोपी ने उसे अपने मार्गदर्शन में काम दिलाने का भरोसा दिया और रहने के लिए किराए का कमरा भी उपलब्ध कराया। इसके बाद कथित तौर पर आरोपी ने अपनी पत्नी को तलाक देकर उससे शादी करने का आश्वासन दिया और इसी आधार पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि शारीरिक संबंधों के दौरान वीडियो बनाया गया और बाद में उसी वीडियो के जरिए महिला को ब्लैकमेल किया गया। इसके अलावा महिला ने धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाए जाने का आरोप भी लगाया।
बचाव पक्ष ने बताया- संबंध आपसी सहमति से थे
आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त और अधिवक्ता सिद्धार्थ बेंदेल ने पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि दोनों पक्ष बालिग हैं और पेशे से अधिवक्ता हैं। दोनों के बीच संबंध स्वैच्छिक थे।
बचाव पक्ष ने विशेष रूप से 26 फरवरी 2026 को महिला द्वारा निष्पादित शपथ पत्र और 20 जुलाई 2026 के लिव-इन रिलेशनशिप एग्रीमेंट का हवाला दिया। दलील दी गई कि इन दस्तावेजों से दोनों के बीच संबंध और साथ रहने की सहमति का संकेत मिलता है।
अभियोजन और महिला पक्ष ने किया जमानत का विरोध
वहीं अभियोजन और महिला पक्ष की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध किया गया। उनकी ओर से आरोप लगाया गया कि आरोपी ने पहली बार शारीरिक संबंध बनाते समय वीडियो रिकॉर्ड कर लिया था और बाद में उसी के आधार पर महिला को ब्लैकमेल किया।
यह भी दलील दी गई कि महिला ने शादी के भरोसे पर संबंध बनाए थे और बाद में आरोपी द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया गया। ऐसे गंभीर आरोपों को देखते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने की मांग की गई।
शिकायत में देरी और दस्तावेजों पर कोर्ट ने दिया ध्यान
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने केस डायरी और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया। अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि एफआईआर के अनुसार दोनों पक्ष वर्ष 2024 से एक-दूसरे के संपर्क में थे, जबकि शिकायत 3 अगस्त 2026 को दर्ज हुई।
इस अवधि के दौरान 26 फरवरी 2026 को शपथ पत्र और 20 जुलाई 2026 को लिव-इन रिलेशनशिप एग्रीमेंट निष्पादित किया गया था।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया मामले को आपसी सहमति से जुड़ा माना और आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दिया।
BNS और धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धाराओं में दर्ज था मामला
पुलिस ने 3 अगस्त 2026 को आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 351(3) के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम तथा मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3/5 के तहत मामला दर्ज किया था।
हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अग्रिम जमानत मंजूर करते हुए आरोपी को जांच में सहयोग करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत का आदेश अंतिम निष्कर्ष नहीं
गौरतलब है कि अग्रिम जमानत का आदेश मामले में आरोपी की अंतिम निर्दोषता का निर्णय नहीं होता। हाईकोर्ट ने इस स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर प्रथम दृष्टया आकलन करते हुए राहत दी है। मामले की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया में आरोपों की सत्यता पर अंतिम निर्णय संबंधित न्यायालय द्वारा किया जाएगा।




