---Advertisement---

26 जनवरी का भूला इतिहास, राजपथ पर क्यों बुलाया गया था पाकिस्तान का शीर्ष नेता

By: संवाददाता । विराट वसुंधरा

On: Wednesday, January 21, 2026 8:24 AM

26 जनवरी का भूला इतिहास, राजपथ पर क्यों बुलाया गया था पाकिस्तान का शीर्ष नेता
Google News
Follow Us
---Advertisement---
🕒 Updated: 23 Jan 2026, 09:33 AM

भारत हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस बड़े गर्व और सम्मान के साथ मनाता है। इसी दिन वर्ष 1950 में देश में भारतीय संविधान लागू हुआ था और भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना। साल 2026 में भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। इस अवसर पर हर साल किसी न किसी देश के प्रतिष्ठित नेता को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा किस्सा भी दर्ज है, जो आज के भारत पाकिस्तान संबंधों को देखते हुए हैरान कर देता है। करीब 70 साल पहले भारत ने अपने गणतंत्र दिवस समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल को मुख्य अतिथि बनाया था। उस दौर में भारत और पाकिस्तान के रिश्ते आज जैसे तनावपूर्ण नहीं थे, लेकिन आने वाले वर्षों में हालात पूरी तरह बदल गए।

पाकिस्तान के गवर्नर जनरल का भारत आगमन

साल 1955 में भारत ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। यह फैसला उस समय भारत की उदार कूटनीति और लोकतांत्रिक आत्मविश्वास को दर्शाता था। मलिक गुलाम मोहम्मद का भारत से गहरा नाता रहा था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की थी और ब्रिटिश शासन के दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में काम किया था। स्वतंत्रता से पहले वे इंडियन रेलवे अकाउंट्स सर्विस का हिस्सा भी रहे और हैदराबाद के निजाम के वित्तीय सलाहकार की भूमिका निभा चुके थे। भारत आने पर उनका भव्य स्वागत किया गया और उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड में राजपथ पर मुख्य अतिथि के रूप में सलामी ली।

पाकिस्तान की राजनीति में विवादास्पद भूमिका

मलिक गुलाम मोहम्मद ने पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या के बाद वर्ष 1951 में गवर्नर जनरल का पद संभाला था। उनके कार्यकाल को पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में बेहद विवादास्पद माना जाता है। उन्होंने सत्ता में रहते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं में हस्तक्षेप किया और कई बड़े संवैधानिक फैसले लिए। वर्ष 1953 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया। इसके बाद 1954 में पाकिस्तान की संविधान सभा को भंग कर दिया गया। इन कदमों को उस समय के सैन्य नेतृत्व का समर्थन प्राप्त था। इसी सैन्य नेतृत्व में जनरल अयूब खान भी शामिल थे, जो आगे चलकर पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने। इन घटनाओं ने पाकिस्तान में लोकतंत्र को कमजोर किया और सत्ता संघर्ष की नींव रखी।

इतिहास में दर्ज एक विरोधाभासी घटना

बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अक्सर तनाव और अविश्वास से भरे रहे हैं। इसके बावजूद 1955 में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल को भारत के गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करना एक असाधारण कदम था। यह वही वर्ष था जब गणतंत्र दिवस समारोह से जुड़ी कई परंपराएं स्थापित की गईं, जो आज भी जारी हैं। बाद के वर्षों में वही नेता पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने और तख्तापलट जैसे कदमों से जुड़ा रहा। यही कारण है कि यह घटना इतिहास में एक गहरे विरोधाभास के रूप में याद की जाती है। यह किस्सा बताता है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्ते समय और परिस्थितियों के साथ कैसे बदलते हैं और इतिहास किस तरह वर्तमान को समझने का आईना बन जाता है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment