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डॉलर के मुकाबले रुपये की बढ़ती-घटती कीमत का असर आम आदमी पर क्या होगा

डॉलर के मुकाबले रुपये की बढ़ती-घटती कीमत का असर आम आदमी पर क्या होगा
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🕒 Updated: 23 Jan 2026, 09:33 AM

मुद्रा का मूल्य उस मुद्रा की कीमत को दर्शाता है जो किसी अन्य मुद्रा के मुकाबले होती है। उदाहरण के लिए, यदि आज 1 अमेरिकी डॉलर (USD) = 90 भारतीय रुपये (INR) है, तो इसका मतलब यह है कि 1 डॉलर खरीदने के लिए 90 रुपये चाहिए। जब कहा जाता है कि रुपया मजबूत हुआ है, तो इसका अर्थ है कि अब 1 डॉलर खरीदने के लिए कम रुपये चाहिए, जैसे 90 से घटकर 88 रुपये। वहीं, अगर रुपया कमजोर हुआ है, तो 1 डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये चाहिए, जैसे 90 से बढ़कर 95 रुपये। मुद्रा का मूल्य अचानक नहीं बदलता, बल्कि यह रोजाना आपूर्ति और मांग, देश की आर्थिक स्थिति, ब्याज दरें, व्यापार, निवेश, भरोसा और नीतियों के मिलाजुले प्रभाव से बदलता रहता है।

मुद्रा के मजबूत होने के कारण

जब किसी देश की मुद्रा की मांग बढ़ती है या उसकी आपूर्ति कम होती है, तो मुद्रा का मूल्य मजबूत होता है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे देश में निवेश बढ़ना, निर्यात का बढ़ना, ब्याज दरों का आकर्षक होना, मुद्रास्फीति का नियंत्रण और जोखिम का कम होना। उदाहरण के तौर पर, अगर भारत की दवाइयां, आईटी सेवाएं या ऑटो पार्ट्स विदेशी बाजार में ज्यादा बिकने लगें, तो विदेशी खरीदार रुपये की मांग करेंगे जिससे रुपये की मांग बढ़ेगी और मुद्रा मजबूत होगी। इसी तरह, विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करेंगी तो उन्हें डॉलर को रुपये में बदलना होगा, जिससे भी रुपये की मांग बढ़ेगी। इसके अलावा यदि भारत की ब्याज दरें अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा आकर्षक होंगी तो निवेशक भारत की मुद्रा खरीदेंगे जिससे मुद्रा का मूल्य बढ़ेगा। साथ ही, अगर देश में मुद्रास्फीति नियंत्रित रहे तो मुद्रा की क्रय शक्ति बनी रहती है और बाजार में उस मुद्रा में भरोसा बढ़ता है। व्यापार घाटे में कमी भी मुद्रा को मजबूत करती है क्योंकि आयात घटने या निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा का निर्गम कम होता है।

मुद्रा कमजोर होने के कारण

जब मुद्रा की मांग कम होती है या आपूर्ति बढ़ जाती है तो मुद्रा कमजोर होती है। इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं जैसे आयात में तेजी से वृद्धि, विदेशी निवेश का बाहर जाना, घरेलू मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी, नीति अस्थिरता या राजनीतिक जोखिम, और ब्याज दरों में गिरावट। उदाहरण के लिए, यदि देश को बड़ी मात्रा में तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स या खाद्य पदार्थ आयात करने पड़ें, तो उसे विदेशी मुद्रा खरीदनी होगी जिससे स्थानीय मुद्रा पर दबाव पड़ेगा और वह कमजोर हो सकती है। विदेशी निवेशकों द्वारा शेयर या बॉन्ड बेचकर पैसा निकालने पर भी मुद्रा कमजोर होती है क्योंकि निवेशकों को रुपये को डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा में बदलना पड़ता है। घरेलू मुद्रास्फीति बढ़ने पर मुद्रा की वास्तविक कीमत गिर जाती है, जिससे लोग उस मुद्रा से दूर होते हैं। राजनीतिक अस्थिरता या बार-बार नीति परिवर्तन से निवेशकों का भरोसा घटता है और वे पैसा निकाल लेते हैं, जिससे मुद्रा की कीमत गिरती है।

मुद्रा के उतार-चढ़ाव का आम आदमी पर प्रभाव

जब रुपये की कीमत मजबूत होती है, तो विदेशी वस्तुएं जैसे तेल, मोबाइल फोन और विदेशी शिक्षा सस्ती हो जाती हैं, और विदेश यात्रा भी सस्ती पड़ती है। लेकिन निर्यातकों की कमाई पर दबाव पड़ता है क्योंकि उनके उत्पाद महंगे हो जाते हैं। वहीं, जब रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है, विदेशी शिक्षा और यात्रा महंगी हो जाती है, लेकिन निर्यातकों को फायदा होता है क्योंकि उनके उत्पाद विदेशों में सस्ते हो जाते हैं और उनकी बिक्री बढ़ती है। इस प्रकार मुद्रा का मूल्य रोजमर्रा की जिंदगी और व्यापार दोनों पर गहरा प्रभाव डालता है। मुद्रा का मूल्य मांग और आपूर्ति का खेल है जो व्यापार, निवेश, ब्याज दरों, मुद्रास्फीति, विश्वास और वैश्विक घटनाओं से लगातार प्रभावित होता रहता है। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और वैश्विक भरोसा बढ़ता है तो मुद्रा मजबूत होती है, और जब घाटे, मुद्रास्फीति, अस्थिरता या पूंजी निकासी बढ़ती है तो मुद्रा कमजोर होती है।

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