दुनिया के सबसे मज़बूत माने जाने वाले US डॉलर को लेकर हाल के दिनों में कई सवाल उठे हैं, क्या डॉलर कमज़ोर हो रहा है? दुनिया नए ऑप्शन क्यों ढूंढ रही है?
दुनिया (World) के सबसे मज़बूत(the strongest) माने जाने वाले US डॉलर को लेकर हाल के दिनों में कई सवाल उठे (many questions arose) हैं। दशकों से डॉलर ग्लोबल ट्रेड (dollar global trade), इन्वेस्टमेंट (investment) और रिज़र्व करेंसी के तौर पर मज़बूती से टिका हुआ है, लेकिन अब इंटरनेशनल लेवल (international level) पर इसकी भूमिका को लेकर नई बहसें (new debates) हो रही हैं।
US की इकोनॉमिक पॉलिसी (economic policy) , इंटरेस्ट रेट में उतार-चढ़ाव और ग्लोबल टेंशन भी डॉलर की पोज़िशन (dollar position) पर असर डाल रहे हैं। जब डॉलर मज़बूत होता है, तो उभरती हुई इकॉनमी पर दबाव बढ़ता है, जबकि कमज़ोर डॉलर ग्लोबल मार्केट (weak dollar global market) को एक अलग तरह का सिग्नल भेजता है। इसीलिए दुनिया अब एक ही करेंसी पर डिपेंड रहने के बजाय दूसरे ऑप्शन ढूंढ (find option) रही है।
कई देश आपसी ट्रेड में लोकल करेंसी (local currency) का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। कुछ देश डॉलर पर डिपेंडेंसी कम करने के लिए दूसरे पेमेंट सिस्टम (payment system) और करेंसी एग्रीमेंट(Currency Agreement) की ओर बढ़ रहे हैं। यह बदलाव अचानक (change suddenly) नहीं है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे इकॉनमिक (economic) और पॉलिटिकल हालात (political situation) का नतीजा है।





