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Mauganj MP:‘व्हाट्सऐपिया पत्रकारिता’ पर सवाल—पत्रकार की पहचान तय करने का अधिकार किसे?

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🕒 Updated: 02 Oct 2026, 02:53 AM

Mauganj MP:‘व्हाट्सऐपिया पत्रकारिता’ पर सवाल—पत्रकार की पहचान तय करने का अधिकार किसे?

 

 

नव स्वदेश की खबर पर मऊगंज के पत्रकारों की आपत्ति, बोले—पहचान पर सवाल है तो आधार और प्रमाण भी सार्वजनिक हों

मऊगंज। पत्रकारिता की पहचान को लेकर प्रकाशित एक खबर ने मऊगंज में नया सवाल खड़ा कर दिया है। नव स्वदेश में प्रकाशित खबर में ‘व्हाट्सऐपिया पत्रकारिता’ और सोशल मीडिया के माध्यम से होने वाली पत्रकारिता को लेकर की गई टिप्पणी पर स्थानीय पत्रकारों ने आपत्ति जताई है। पत्रकारों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की पेशेवर पत्रकारिता की पहचान पर सवाल उठाया जाता है, तो उसके पीछे मौजूद नियम, मापदंड, दस्तावेज और प्रमाण भी सार्वजनिक होने चाहिए।
मामला अब केवल किसी एक खबर की भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल पत्रकारिता की पहचान तय करने की प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है।

 

 

आखिर ‘व्हाट्सऐप पत्रकार’ की परिभाषा क्या है?

मऊगंज के पत्रकारों का सीधा सवाल है कि आखिर ‘व्हाट्सऐप पत्रकार’ या ‘व्हाट्सऐपिया पत्रकारिता’ की श्रेणी निर्धारित करने का आधिकारिक आधार क्या है?
क्या किसी सरकारी विभाग की पत्रकार सूची में नाम दर्ज होना ही पत्रकार होने का अंतिम प्रमाण है? यदि ऐसा कोई निर्धारित नियम या प्रशासनिक मापदंड है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि पत्रकारिता से जुड़े लोगों के बीच भ्रम की स्थिति समाप्त हो।
पत्रकारों का कहना है कि सरकारी सूची किसी विशेष प्रशासनिक या विभागीय प्रयोजन के लिए तैयार की गई सूची हो सकती है। लेकिन केवल किसी सूची में नाम होने या नहीं होने के आधार पर किसी व्यक्ति की पत्रकारिता की वैधता अथवा पेशेवर पहचान पर निष्कर्ष निकालना अलग विषय है।

 

 

विपिन पाण्डेय ने उठाया दस्तावेजों का सवाल

बघेली मऊगंज समाचार साप्ताहिक के संपादक विपिन पाण्डेय का कहना है कि उन्होंने जनसंपर्क विभाग के PRO समर्थ श्रीवास्तव को पत्रकारिता से संबंधित अपने दस्तावेज उपलब्ध कराए थे। उनका सवाल है कि यदि इसके बावजूद किसी सूची में उनका अथवा अन्य पत्रकारों का नाम शामिल नहीं किया गया, तो केवल सूची में नाम नहीं होने के आधार पर उनकी पत्रकारिता और संपादकीय पहचान पर सवाल किस आधार पर उठाया जा सकता है?
पाण्डेय का कहना है कि इस संबंध में संबंधित विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि कोई निर्धारित पात्रता अथवा मान्यता का मापदंड है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

 

 

‘सूची’ बनाम ‘पत्रकारिता’—बहस यहीं से शुरू

पत्रकारों का कहना है कि किसी सरकारी सूची में नाम होना प्रशासनिक रिकॉर्ड का विषय हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता की वास्तविक पहचान का आकलन करते समय संस्थान, प्रकाशित सामग्री, संपादकीय जिम्मेदारी, उपलब्ध दस्तावेज और पत्रकार के कार्य जैसे पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या किसी सूची को पत्रकारिता की पहचान का अंतिम प्रमाण मान लिया जाए, या संबंधित पत्रकार के दस्तावेज और उसके संस्थान का पक्ष भी सामने रखा जाए?

 

 

कौन तय करेगा—कौन पत्रकार है और कौन नहीं?

मऊगंज के पत्रकारों ने एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया है—आखिर जिले में कौन पत्रकार है, कौन नहीं है और किसे ‘व्हाट्सऐप पत्रकार’ कहा जाएगा?
क्या इसके लिए कोई लिखित नियम है?
क्या इसके लिए कोई अधिकृत संस्था या प्राधिकरण है?
क्या किसी मीडिया संस्थान का स्थानीय संवाददाता पत्रकार की पहचान के लिए पर्याप्त है, या इसके लिए सरकारी सूची में नाम होना अनिवार्य है?
और यदि कोई निर्धारित मापदंड है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

 

 

पत्रकारों का कहना है कि किसी व्यक्ति की पेशेवर पहचान पर सवाल उठाने वाली संज्ञा का इस्तेमाल सामान्य टिप्पणी नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसी टिप्पणी के पीछे ठोस तथ्य और प्रमाण होना जरूरी है।
खबर में जिनकी पहचान प्रभावित हुई, उनका पक्ष भी जरूरी
पत्रकारों का कहना है कि यदि प्रकाशित खबर में किसी व्यक्ति अथवा पत्रकार समूह की पहचान को लेकर टिप्पणी की गई है, तो पत्रकारिता के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप संबंधित पक्ष का पक्ष जानना और उसका जवाब प्रकाशित करना भी महत्वपूर्ण है।
इसी आधार पर मऊगंज के पत्रकारों ने नव स्वदेश के प्रधान संपादक और रीवा के जिम्मेदार संपादकीय प्रतिनिधियों से आग्रह किया है कि प्रकाशित खबर के आधार, उपलब्ध दस्तावेज और अपनाए गए मापदंड स्पष्ट किए जाएं तथा जिन पत्रकारों की पहचान पर सवाल उठा है, उनका पक्ष भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाए।

 

 

असली मुद्दा शब्द नहीं, मापदंड है

पत्रकारों का कहना है कि पत्रकारिता में संस्थागत मतभेद, विचारों का अंतर और खबरों को लेकर असहमति स्वाभाविक है। लेकिन किसी पत्रकार को किसी विशेष श्रेणी में रखने अथवा उसकी पेशेवर पहचान पर सवाल उठाने के लिए स्पष्ट आधार और प्रमाण होना चाहिए।
मऊगंज में उठ रहा सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति या एक संस्थान का मामला नहीं, बल्कि पत्रकारिता की पहचान और उसके मापदंड से जुड़ा प्रश्न है।

 

सवाल सीधा है—पत्रकार की पहचान आखिर तय कौनकरेगा?

सरकारी सूची, किसी व्यक्ति की राय, किसी स्थानीय प्रतिनिधि का आकलन या वर्षों से किए जा रहे पत्रकारिता कार्य और उपलब्ध दस्तावेज?
यदि कोई निश्चित मापदंड है तो उसे सामने रखा जाए।
यदि कोई सूची अंतिम आधार है तो उसके नियम सार्वजनिक किए जाएं।
और यदि किसी पत्रकार की पहचान पर सवाल उठाया गया है, तो उसके पास मौजूद दस्तावेज और उसका पक्ष भी सामने रखा जाए।

क्योंकि सवाल सिर्फ ‘व्हाट्सऐपिया पत्रकारिता’ शब्द का नहीं है—सवाल यह है कि पत्रकार होने का पैमाना आखिर तय कौन करता है?

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