Rewa MP: रीवा में जीतू पटवारी का दौरा : UGC बिल और प्रबुद्ध समाज के निशाने पर होंगे कांग्रेस अध्यक्ष,,
मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी का कल रीवा आगमन प्रस्तावित है। औपचारिक रूप से वे एक निजी विवाह समारोह के रिसेप्शन में शामिल होने आ रहे हैं, लेकिन इस दौरे को पार्टी संगठन के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि सीमित समय के बावजूद वे रीवा संभाग के अंतर्गत आने वाले जिलों की संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से कांग्रेस को मज़बूत करने का संदेश देंगे।
हालांकि, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि प्रत्येक जिले के लिए मात्र 30 मिनट का समय देकर क्या वास्तव में कोई ठोस संगठनात्मक बदलाव संभव है, या फिर यह दौरा भी पूर्व की तरह औपचारिकता निभाकर लौट जाने तक सीमित रह जाएगा। रीवा संभाग के सिंगरौली, सतना, मऊगंज, मैहर और सीधी जैसे जिलों से कांग्रेस पदाधिकारी और नेता लंबी दूरी तय कर बैठक में शामिल होंगे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रदेश अध्यक्ष का यह अतिअल्प समय उन्हें उत्साहित करेगा या निराश।
इसी बीच, रीवा जिले में UGC बिल के विरोध को लेकर माहौल लगातार गर्म है। समूचे जिले में विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन और कार्यक्रम जारी हैं। खबर है कि कल भारत बंद के समर्थन में रीवा बंद रहेगा और विवेकानंद पार्क, रीवा में UGC बिल के विरोध में सवर्ण समाज का एक बड़ा एकत्रीकरण और प्रदर्शन आयोजित किया गया है। सवर्ण एकता समूह से जुड़े लोगों ने इस अवसर पर भाजपा और कांग्रेस—दोनों दलों से सवाल पूछने की रणनीति बनाई है ऐसे में UGC बिल को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सवर्णों के निशाने पर होंगे।
यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील हो गया है क्योंकि जीतू पटवारी हाल के दिनों में पिछड़े वर्ग के आरक्षण की जोरदार वकालत कर चुके हैं, लेकिन UGC बिल पर उनकी ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि कल यह विषय खुलकर उठ सकता है और प्रदेश अध्यक्ष को विरोध का सामना करना पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा के सवर्ण नेताओं को भी UGC बिल पर चुप्पी साधने के कारण विरोध झेलना पड़ सकता है।
रीवा दौरे को कांग्रेस संगठन में सुधार की पहल के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके समानांतर एक और महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि भी है। बीते सितंबर माह से कांग्रेस परिवार के प्रबुद्ध (ब्राह्मण) नेताओं द्वारा रीवा संभाग सहित सभी जिला मुख्यालय में लगातार चिंतन बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। इन बैठकों में राहुल गांधी की “जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी” की भावना के आधार पर पार्टी संगठन में उचित प्रतिनिधित्व और लोकसभा-विधानसभा चुनावों में हिस्सेदारी की मांग की जा रही है। इसके साथ ही राज्यसभा के लिए उम्मीदवारी भी सवर्ण समाज को रीवा संभाग से तय करने की बात कही जा रही है इन नेताओं का तर्क है कि यदि पार्टी इस दिशा में गंभीर निर्णय लेती है, तो इसका सीधा लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा।
देखा जाए तो रीवा संभाग देश के सबसे अधिक ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्रों में गिना जाता है। सामान्य समीक्षा करें तो इस संभाग में कुल तीन लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से दो पर ब्राह्मण सांसद निर्वाचित हैं। इसी तरह संभाग की कुल 22 विधानसभा सीटों में से 5 आरक्षित और 17 अनारक्षित हैं, जिनमें 8 सीटों पर ब्राह्मण विधायक चुने गए हैं। जिला पंचायत, जनपद पंचायत और नगरीय निकायों की अनारक्षित सीटों पर भी ब्राह्मण समाज का उल्लेखनीय वर्चस्व रहा है।
तो वहीं कांग्रेस के मुकाबले भाजपा ने इस सामाजिक समीकरण को समझते हुए लोकसभा, विधानसभा और संगठन—तीनों स्तरों पर ब्राह्मण समाज को अग्रणी स्थान दिया है। यही कारण है कि इसी संभाग से राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया है। किन्तु इसके विपरीत, कांग्रेस पर आरोप लगते रहे हैं कि पिछले कई पंचवर्षीय के चुनाव में उसने लोकसभा और विधानसभा टिकटों में इस समाज की भागीदारी लगातार घटाई है। संगठन सृजन के नाम पर पार्टी के भीतर ब्राह्मणों के बचे-खुचे अस्तित्व को भी समाप्त करने की कोशिश की गई।
पूर्व में सतना ग्रामीण, मऊगंज, सिंगरौली ग्रामीण और रीवा ग्रामीण जैसे जिलों में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष ब्राह्मण समाज से थे, लेकिन वर्तमान में पार्टी ने इस ब्राह्मण समाज की संख्या और राजनैतिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ करते हुए केवल रीवा ग्रामीण में ही इस समाज को प्रतिनिधित्व दिया है। अब यह चर्चा भी ज़ोर पकड़ रही है कि रीवा ग्रामीण से भी ब्राह्मण जिलाध्यक्ष को हटाकर पिछड़े वर्ग के नेता को बैठाने की तैयारी की जा रही है, और इस दिशा में स्वयं जीतू पटवारी की भूमिका बताई जा रही है।
कुल मिलाकर, जीतू पटवारी का रीवा दौरा कई विवादों और सवालों के साये में दिखाई दे रहा है। एक ओर UGC बिल के विरोध में सवर्ण समाज की मुखरता, दूसरी ओर 30-30 मिनट की बैठकों को लेकर उठ रही “खानापूर्ति” की आशंका, और साथ ही रीवा संभाग के प्रबुद्ध समाज के साथ अलग से बैठक न करने पर अंदरखाने पनपता असंतोष—ये सभी संकेत पटवारी के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि इन तमाम आशंकाओं, असंतोष और भविष्य के संकेतों के बीच जीतू पटवारी अपने इस दौरे से पार्टी को कोई वास्तविक संजीवनी दे पाते हैं, या फिर यह यात्रा भी विवादों में घिरी एक और औपचारिक राजनीतिक गतिविधि बनकर रह जाती है।