Mauganj MP:सीएम के निर्देश बनाम जमीनी हकीकत: क्या मऊगंज थाना महिलाओं की सुरक्षा के प्रति गंभीर है?
मऊगंज। एक ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश में कानून व्यवस्था को मजबूत बनाने, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और पुलिस व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए लगातार समीक्षा बैठकें कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मऊगंज जिला मुख्यालय से सामने आ रहे कुछ मामले इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
हाल ही में मुख्यमंत्री ने गृह विभाग की समीक्षा बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए कि महिलाओं से जुड़े अपराधों के प्रति पुलिस संवेदनशीलता और गंभीरता से कार्य करे। उन्होंने कानून व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर आरक्षक स्तर तक सक्रिय भूमिका निभाने पर जोर दिया। लेकिन मऊगंज थाना क्षेत्र में एक पीड़ित महिला के साथ हुई कथित घटनाओं ने स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
जानकारी के अनुसार वार्ड क्रमांक 3 निवासी एक महिला ने आरोप लगाया कि पति और पुत्र की गैरमौजूदगी में कुछ लोगों द्वारा उसे और उसकी बेटियों को लगातार परेशान किया जा रहा था। महिला का कहना है कि उसने अपनी समस्या लेकर थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया, लेकिन उसकी बात को गंभीरता से नहीं सुना गया। आरोप है कि शिकायत पर तत्काल आवश्यक कार्रवाई करने के बजाय उसे न्याय के लिए भटकना पड़ा।
पीड़िता अंततः पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंची और वहां अपनी समस्या रखी। इसके बाद उसका आवेदन पुनः थाना भेजा गया। लेकिन सवाल यह है कि यदि मामला वास्तव में महिला सुरक्षा और उत्पीड़न से जुड़ा था तो थाना स्तर पर ही उसकी शिकायत को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि थाना क्षेत्र में अपराध के आंकड़े नियंत्रित रखने के लिए कई मामलों में एफआईआर दर्ज करने से बचने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह न केवल पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है, बल्कि पीड़ितों के न्याय पाने के अधिकार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
सबसे गंभीर प्रश्न थाना प्रभारी की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। एक महिला थाना प्रभारी होने के नाते आमजन की अपेक्षा रहती है कि महिलाओं से जुड़े मामलों में अधिक संवेदनशील और त्वरित कार्रवाई होगी। लेकिन यदि पीड़ित महिला के आरोपों में सच्चाई है, तो यह स्थिति चिंता का विषय है। न्याय की उम्मीद लेकर थाना पहुंची महिला यदि स्वयं को असहाय और उपेक्षित महसूस करे तो पुलिस व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
यह भी चर्चा का विषय है कि शिकायतकर्ता को राहत और सुरक्षा का भरोसा देने के बजाय दोनों पक्षों पर एक साथ कार्रवाई की बात कहे जाने से पीड़ित पक्ष स्वयं को दबाव में महसूस कर सकता है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई ही कानून सम्मत रास्ता माना जाता है।
मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब उनकी भावना जमीनी स्तर तक पहुंचे। महिलाओं की सुरक्षा केवल बैठकों और निर्देशों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रत्येक थाना उसे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी माने। मऊगंज की यह घटना प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है कि आखिर मुख्यमंत्री की मंशा और स्थानीय स्तर की कार्यप्रणाली के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई दे रहा है।





