Mauganj MP:प्राइवेट ड्राइवर के साथ पॉकेट गवाह और थाने की ‘सुपर पावर’ पर उठे सवाल!मऊगंज थाना या निजी दरबार?
मऊगंज। मऊगंज थाना इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि एक निजी व्यक्ति वर्षों से थाने के भीतर ऐसी पकड़ बनाए हुए है कि थाना प्रभारी बदलते रहे, लेकिन उसका प्रभाव कम नहीं हुआ। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक प्राइवेट व्यक्ति किस अधिकार से पुलिस वाहन चलाता है और कई मामलों में कथित तौर पर गवाह भी बन जाता है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस व्यक्ति ने कभी थाने में बिजली फिटिंग और मेंटेनेंस जैसे कार्यों से अपनी पहचान बनाई थी, वही आज थाने की कार्यप्रणाली का अभिन्न हिस्सा बन गया है। आरोप यह भी है कि कई मामलों में वह पुलिस और आम जनता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता दिखाई देता है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कोई निजी व्यक्ति पुलिस वाहन चला रहा है, तो क्या इसके लिए विभागीय अनुमति है? क्या पुलिस नियम किसी आम नागरिक को सरकारी वाहन चलाने और पुलिस कार्यों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने की अनुमति देते हैं? यदि नहीं, तो यह व्यवस्था किसके संरक्षण में चल रही है?
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब आरोप लगते हैं कि वही व्यक्ति कई प्रकरणों में गवाह के रूप में भी सामने आता है। कानून के जानकारों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बार-बार अलग-अलग मामलों में गवाह बन रहा है, तो उसकी भूमिका और निष्पक्षता की जांच होना आवश्यक है।
गौरतलब है कि पूर्व में थाना नईगढ़ी क्षेत्र में भी कथित “पॉकेट गवाह” और प्राइवेट व्यक्ति द्वारा पुलिस वाहन चलाने का मामला सामने आया था, जिसके बाद कार्रवाई हुई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि वहां कार्रवाई हो सकती है, तो मऊगंज में आरोपों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं हो रही?
इतना ही नहीं, पूर्व में लेन-देन से जुड़े एक वायरल वीडियो को लेकर भी चर्चाएं हुई थीं, जिसमें कथित रूप से अधिकारियों के नाम पर रकम वसूले जाने के आरोप लगे थे। हालांकि उन आरोपों की सत्यता और जांच का निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो पाया।
अब जनता पूछ रही है कि आखिर दयाशंकर तिवारी की थाने में ऐसी कौन-सी भूमिका है, जो वर्षों से बनी हुई है? क्या यह केवल विश्वास का मामला है या इसके पीछे कोई और वजह है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या मऊगंज थाना कानून से चलेगा या किसी कथित निजी प्रभाव से?





