🕒 Updated: 01 Oct 2026, 03:08 AM
Mauganj MP:एसपी साहब जवाब जरूर दीजिए—सवाल बहुत बड़ा है 70 मिनट में FIR संयोग या प्रयोग!
पत्रकार पर FIR से पहले अभियोजन स्वीकृति क्यों नहीं? सुरक्षा का अधिकार सिर्फ मंत्री, विधायक और अधिकारियों के लिए है?
मऊगंज। पुलिस कार्रवाई और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल पुलिस प्रशासन से जवाब मांग रहा है—क्या सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछने वाले पत्रकार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से पहले उसकी रिपोर्टिंग, दस्तावेजों और अभिव्यक्ति की प्रकृति की निष्पक्ष जांच नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून में लोक सेवकों के लिए कुछ परिस्थितियों में अभियोजन से पहले स्वीकृति की व्यवस्था है। वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 के तहत निर्धारित श्रेणी के न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों और लोक सेवकों के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़े कथित अपराधों में अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले सक्षम सरकार की पूर्व स्वीकृति का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट कर चुका है कि इस तरह की सुरक्षा का उद्देश्य लोक सेवकों को कानून से ऊपर रखना नहीं, बल्कि आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े मामलों में अनावश्यक या दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से सुरक्षा देना है। यह सुरक्षा असीमित नहीं है।
लेकिन पत्रकार के मामले में तस्वीर अलग है। पत्रकार कोई लोक सेवक नहीं है और उसे अभियोजन स्वीकृति की ऐसी वैधानिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि पत्रकार को भी वही कानूनी छूट क्यों नहीं दी गई, बल्कि सवाल यह है कि जब आरोप सीधे उसकी रिपोर्टिंग, लिखित सामग्री, सवाल या अभिव्यक्ति से जुड़ा हो, तब क्या पुलिस को संवैधानिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई से पहले मामले की प्रकृति की गंभीरता से जांच नहीं करनी चाहिए?
पत्रकार कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी पत्रकार ने वास्तव में कोई अपराध किया है तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि विवाद का मूल कारण उसकी खबर, रिपोर्ट, सवाल या किसी सरकारी व्यवस्था पर की गई आलोचना है, तो यह देखना भी जरूरी है कि क्या रिपोर्टिंग में कोई स्वतंत्र आपराधिक तत्व मौजूद है या केवल असहमति अथवा आलोचनात्मक पत्रकारिता को आपराधिक मामले का रूप दिया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
मार्च 2025 के एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति से जुड़े अपराधों के संदर्भ में कहा कि जहां कथित संज्ञेय अपराध लिखित या मौखिक शब्दों से जुड़ा हो और अधिकतम सजा सात वर्ष तक हो, वहां कानून में उपलब्ध व्यवस्था के तहत प्रारंभिक जांच करना उचित हो सकता है, ताकि यह देखा जा सके कि प्रथमदृष्टया मामला बनता भी है या नहीं। अदालत ने इस प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रारंभिक जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति को कानून से बाहर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस कार्रवाई संवैधानिक अधिकारों के साथ संतुलित रहे।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—
अगर किसी पत्रकार ने किसी मंत्री से सवाल पूछा, किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली पर रिपोर्ट की, किसी सरकारी योजना में कथित अनियमितता को दस्तावेजों के साथ उठाया या प्रशासन के सामने सवाल रखे और उसके बाद उसके खिलाफ FIR दर्ज होती है, तो क्या FIR से पहले यह नहीं देखा जाना चाहिए कि आरोप वास्तव में किस कृत्य पर आधारित हैं?
पत्रकार को विशेषाधिकार नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया चाहिए
पत्रकार यह नहीं कह रहा कि उसे अपराध करने की छूट मिले। सवाल सिर्फ इतना है कि उसकी कलम को अपराध साबित करने से पहले उसकी खबर पढ़ी जाए, उसके दस्तावेज देखे जाएं और आरोपित कृत्य तथा पत्रकारिता के काम के बीच वास्तविक अंतर स्पष्ट किया जाए।
किसी खबर में लगाए गए आरोप सत्य हैं या नहीं, दस्तावेज पर्याप्त हैं या नहीं, किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को कानूनन क्षति पहुंची या नहीं—इन सभी सवालों का अंतिम निर्धारण कानून और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।
लेकिन यदि मामला मूल रूप से अभिव्यक्ति से जुड़ा है तो पुलिस को यह भी ध्यान रखना होगा कि संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और उस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल कानून में निर्धारित आधारों पर ही लगाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के मामलों में भी अभिव्यक्ति से जुड़े आपराधिक मामलों में पुलिस को यांत्रिक तरीके से कार्रवाई करने के बजाय प्रथमदृष्टया कानूनी तत्वों की जांच पर जोर दिया है।





