Mauganj MP:एसपी साहब, सवाल का जवाब देना आपकी नैतिक जिम्मेदारी है—पत्रकार पर FIR से पहले प्रक्रिया क्यों नहीं?
पत्रकार पर FIR से पहले प्रारंभिक जांच क्यों नहीं? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी नहीं?
मऊगंज। पत्रकारों से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई को लेकर एक अहम सवाल सामने आया है—यदि किसी पत्रकार के खिलाफ दर्ज शिकायत सीधे उसकी खबर, रिपोर्टिंग, सवाल या सार्वजनिक मुद्दे पर की गई टिप्पणी से जुड़ी है, तो क्या FIR दर्ज करने से पहले यह जांच जरूरी नहीं कि वास्तव में प्रथमदृष्टया कोई आपराधिक मामला बनता भी है या नहीं?
सवाल किसी पत्रकार को कानून से ऊपर रखने का नहीं है। यदि कोई पत्रकार अपराध करता है तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जब आरोप सीधे उसके लिखे शब्दों, प्रकाशित सामग्री, रिपोर्टिंग या अभिव्यक्ति से संबंधित हों, तब संविधान में मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रियात्मक सुरक्षा पर विचार किया जाना भी उतना ही जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 28 मार्च 2025 को Imran Pratapgadhi v. State of Gujarat मामले में BNSS की धारा 173(3) की व्याख्या करते हुए कहा कि जब कथित संज्ञेय अपराध लिखित या मौखिक अभिव्यक्ति से जुड़ा हो और उसकी सजा तीन वर्ष या उससे अधिक लेकिन सात वर्ष से कम हो, तो FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। अदालत ने इस प्रक्रिया को Article 19(1)(a) में संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जोड़ा।
BNSS की धारा 173(3) में ऐसी प्रारंभिक जांच के लिए DSP से नीचे के अधिकारी से पूर्व अनुमति और निर्धारित अवधि में प्रथमदृष्टया मामले की जांच का प्रावधान है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर पत्रकार को FIR से छूट मिल गई या हर पत्रकार के खिलाफ FIR से पहले जांच अनिवार्य है। कानूनी स्थिति आरोपित अपराध की प्रकृति और उसमें निर्धारित सजा पर निर्भर करती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ विशेष रूप से अभिव्यक्ति से जुड़े उन अपराधों से है जो धारा 173(3) के दायरे में आते हैं।
सवाल पत्रकार का नहीं, प्रक्रिया का है
अगर किसी पत्रकार ने किसी मंत्री से सवाल पूछा, किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली पर रिपोर्ट प्रकाशित की, किसी सरकारी योजना में कथित गड़बड़ी को दस्तावेजों के साथ उठाया या किसी सार्वजनिक मुद्दे पर सवाल खड़े किए और उसके बाद उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होता है, तो यह देखना जरूरी है कि शिकायत में लगाए गए आरोप उसकी पत्रकारिता से अलग किसी आपराधिक कृत्य की ओर इशारा करते हैं या मुख्य रूप से उसकी अभिव्यक्ति से जुड़े हैं।
यही वह बिंदु है जहां पुलिस की कार्रवाई की निष्पक्षता और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है।
पत्रकार को कानून से विशेष छूट नहीं चाहिए। पत्रकार को केवल यह भरोसा चाहिए कि उसकी रिपोर्ट को अपराध मानने से पहले रिपोर्ट पढ़ी जाएगी, उपलब्ध दस्तावेज देखे जाएंगे और यह निर्धारित किया जाएगा कि कथित अपराध के आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया मौजूद हैं या नहीं।
एसपी से सीधे सवाल
ऐसे में मऊगंज पुलिस अधीक्षक से सवाल है—
यदि किसी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई उसकी खबर, रिपोर्ट या अभिव्यक्ति से संबंधित है, तो क्या यह नहीं बताया जाना चाहिए कि आरोप किस विशिष्ट आपराधिक कृत्य के हैं?
क्या संबंधित मामले में BNSS की धारा 173(3) लागू होती है या नहीं?
यदि लागू होती है, तो क्या FIR से पहले निर्धारित प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया अपनाई गई?
और यदि यह प्रक्रिया लागू नहीं होती, तो उसका कानूनी आधार क्या है?
इन सवालों का जवाब किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि कानून की पारदर्शी और समान प्रक्रिया के लिए जरूरी है।
पत्रकार को विशेषाधिकार नहीं, संवैधानिक अधिकारों का सम्मान चाहिए
लोक सेवकों से संबंधित अभियोजन स्वीकृति और पत्रकारों से जुड़े मामलों की कानूनी व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पत्रकार को भी सरकारी अधिकारियों जैसी अभियोजन स्वीकृति का स्वतः अधिकार है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है—पत्रकार होने के कारण किसी व्यक्ति को कानून से बाहर नहीं किया जा सकता, तो केवल पत्रकार होने के कारण उसकी अभिव्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई के जरिए दबाने की स्थिति भी संविधान की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल खड़े कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और पुलिस को ऐसे मामलों में संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए शिकायतों की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए।
सवाल दबाने से नहीं, जवाब देने से खत्म होंगे
पत्रकार और पुलिस प्रशासन के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी खबर से असहमति का जवाब तथ्य और कानून से दिया जा सकता है।
यदि खबर गलत है तो उसका खंडन हो सकता है। यदि तथ्य गलत हैं तो संबंधित पत्रकार के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई का रास्ता खुला है। और यदि वास्तव में आपराधिक कृत्य हुआ है तो कानून अपना काम करेगा।
लेकिन यदि मामला केवल इसलिए आपराधिक कार्रवाई तक पहुंचता है क्योंकि पत्रकार ने सत्ता, प्रशासन या पुलिस से सवाल पूछा, तो यह तय करना आवश्यक है कि कानून का इस्तेमाल अपराध की जांच के लिए हो रहा है या अभिव्यक्ति को लेकर विवाद में।
इसलिए सवाल सीधा है—
एसपी साहब, पत्रकार को विशेषाधिकार नहीं चाहिए। जवाब चाहिए।
यदि कानून में प्रारंभिक जांच का प्रावधान लागू होता है तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ? और यदि लागू नहीं होता तो उसका कानूनी आधार क्या है?
क्योंकि FIR से कोई पत्रकार आरोपी बन सकता है, उसे अदालत का सामना करना पड़ सकता है और वह कानूनी प्रक्रिया से गुजर सकता है। लेकिन लोकतंत्र में यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि सवाल पूछना और अपराध करना—इन दोनों के बीच का फर्क कानून की प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से कायम रहे।





