Panna MP:‘कोई खुशी से रिश्वत दे दे तो हम ले लेते हैं’—EE के बयान से मचा हड़कंप, लोकायुक्त कार्रवाई के बीच उठे बड़े सवाल!
पन्ना। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त की कार्रवाई के बीच जल संसाधन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कथित बयान अब चर्चा का विषय बन गया है। पन्ना में रिश्वत लेते अकाउंटेंट और बाबू की गिरफ्तारी के बाद विभाग के कार्यपालन यंत्री (EE) सीबी अहिरवार से जब रिश्वत को लेकर सवाल किया गया तो उनके जवाब ने पूरे मामले को और गरमा दिया।
बताया जा रहा है कि रिश्वत के सवाल पर अधिकारी ने कहा कि रिश्वत मांगना गलत है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपनी खुशी से पैसे देता है तो वे उसे लेने से मना नहीं करते। अधिकारी के इस कथित बयान का वीडियो/बयान अब सोशल मीडिया पर चर्चा में है और इसे लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
लोकायुक्त की कार्रवाई के बीच बयान ने बढ़ाई हलचल
मामला ऐसे समय सामने आया है, जब पन्ना में जल संसाधन विभाग से जुड़े कर्मचारियों पर लोकायुक्त की कार्रवाई की खबर सामने आई है। अकाउंटेंट और बाबू पर रिश्वत लेने के आरोप में कार्रवाई के बाद विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी बीच विभाग के कार्यपालन यंत्री का रिश्वत को लेकर सामने आया कथित बयान अब बहस का केंद्र बन गया है। सवाल यह है कि क्या रिश्वत केवल मांगने पर ही रिश्वत होती है, या किसी अधिकारी/कर्मचारी द्वारा स्वेच्छा से दिया गया अवैध भुगतान स्वीकार करना भी कानून और सेवा आचरण के दायरे में गंभीर विषय है?
‘खुशी से देने’ की दलील पर उठे सवाल
सरकारी व्यवस्था में किसी अधिकारी या कर्मचारी को उसके पद और सरकारी कार्य के एवज में निजी तौर पर धन प्राप्त होना गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसे में ‘खुशी से देने’ की दलील ने भ्रष्टाचार की परिभाषा और सरकारी तंत्र की जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सोशल मीडिया पर वायरल बताए जा रहे इस बयान को लेकर लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर कोई व्यक्ति किसी सरकारी काम को कराने, सुविधा पाने या प्रक्रिया प्रभावित करने के लिए पैसा देता है, तो उसे महज ‘खुशी से दिया गया पैसा’ कहकर स्वीकार करना क्या उचित माना जा सकता है?
लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद विभाग पर नजर
पन्ना में हुई लोकायुक्त कार्रवाई ने पहले ही जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। अब वरिष्ठ अधिकारी का कथित बयान सामने आने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया है।
हालांकि, किसी बयान या वायरल वीडियो के आधार पर अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। पूरे मामले में संबंधित विभाग, लोकायुक्त अथवा सक्षम जांच एजेंसी की आधिकारिक जांच और तथ्य सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
बड़ा सवाल—भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस या ‘खुशी से’ लेने की छूट?
सरकार लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करती रही है। लोकायुक्त जैसी एजेंसियां रिश्वतखोरी के मामलों में कार्रवाई कर रही हैं। ऐसे माहौल में किसी वरिष्ठ अधिकारी की ओर से रिश्वत को लेकर ऐसा कथित बयान सामने आना निश्चित तौर पर गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़े करता है।
अब निगाह इस बात पर है कि क्या संबंधित विभाग इस बयान का संज्ञान लेगा? क्या अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा? और क्या लोकायुक्त या अन्य सक्षम एजेंसी इस पूरे मामले में कोई तथ्यात्मक जांच करेगी?
फिलहाल, लोकायुक्त की कार्रवाई के बीच सामने आए इस कथित बयान ने पन्ना के जल संसाधन विभाग को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है।





