---Advertisement---

Mauganj MP:मऊगंज पुलिस के प्रेस नोट पर उठे सवाल, क्या पत्रकारिता को असमाजिक तत्व मान कर सरकारी काम में बाधा मानने लगी पुलिस?

Google News
Follow Us
---Advertisement---
🕒 Updated: 28 Sep 2026, 01:48 AM

Mauganj MP:मऊगंज पुलिस के प्रेस नोट पर उठे सवाल, क्या पत्रकारिता को असमाजिक तत्व मान कर सरकारी काम में बाधा मानने लगी पुलिस?

 

 

 

मऊगंज। मऊगंज थाना पुलिस की ओर से जारी एक प्रेस नोट में पत्रकारों और मीडिया से जुड़े लोगों को कथित तौर पर “असामाजिक तत्व” की श्रेणी में संदर्भित किए जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रेस नोट में पुलिस कार्रवाई, अनुसंधान और पुलिस के कामकाज को लेकर सवाल उठाने वाले लोगों पर सरकारी कार्य में बाधा तथा जांच को प्रभावित करने जैसे आरोपों का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है।
इस घटनाक्रम ने मऊगंज में पुलिस और मीडिया के बीच संबंधों को लेकर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना, किसी मामले में पुलिस का पक्ष जानना या अनुसंधान को लेकर सवाल करना अपने आप में सरकारी काम में बाधा माना जा सकता है?

कानून क्या कहता है?

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 221 में लोक सेवक के सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन में स्वेच्छा से बाधा डालने को अपराध बताया गया है। इसके तहत दोषसिद्धि होने पर तीन महीने तक का कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
हालांकि, किसी पत्रकार द्वारा पुलिस कार्रवाई पर सवाल पूछना और वास्तव में किसी लोक सेवक के वैधानिक कार्य में बाधा डालना—इन दोनों परिस्थितियों के बीच कानूनी अंतर महत्वपूर्ण है। किसी विशेष मामले में धारा लागू होती है या नहीं, यह संबंधित घटना के वास्तविक तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करता है।

 

 

 

सवालों के घेरे में प्रेस नोट की भाषा

मऊगंज पुलिस के कथित प्रेस नोट को लेकर पत्रकारों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी पत्रकार ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाया, किसी एफआईआर के आधार पर जानकारी मांगी या अनुसंधान की निष्पक्षता को लेकर सवाल किया, तो क्या उसे “असामाजिक तत्व” की श्रेणी में रखा जाना उचित है?
पत्रकारिता का मूल कार्य ही शासन-प्रशासन और पुलिस सहित सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाना, संबंधित पक्षों का पक्ष जानना और जनहित से जुड़े मामलों को सामने लाना है। वहीं दूसरी ओर पुलिस को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने और जांच को प्रभावित करने वाले वास्तविक हस्तक्षेप के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है।

इसी बिंदु पर पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी हो जाती है।

 

 

“चौथा स्तंभ” या “असामाजिक तत्व”?

मऊगंज में पुलिस के प्रेस नोट को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसकी भाषा को लेकर उठ रहा है। यदि किसी पत्रकार को उसके पेशेवर सवालों या रिपोर्टिंग के कारण असामाजिक तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है, तो यह गंभीर विषय है और इसकी स्पष्टता पुलिस प्रशासन की ओर से सामने आनी चाहिए।
वहीं यदि पुलिस के पास किसी व्यक्ति द्वारा वास्तव में सरकारी कार्य में बाधा डालने, जांच प्रभावित करने या किसी अन्य कानूनी अपराध में संलिप्तता के ठोस तथ्य हैं, तो पुलिस को उन तथ्यों को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना चाहिए।

 

 

पुलिस अधीक्षक की भूमिका पर भी उठे सवाल

थाना स्तर से जारी ऐसे किसी भी प्रेस नोट को लेकर स्वाभाविक रूप से यह सवाल भी उठता है कि क्या वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इसकी भाषा और कानूनी आधार की समीक्षा की थी?
यदि थाना प्रभारी राम सिंह पटेल के नाम से जारी प्रेस नोट में पत्रकारों को लेकर ऐसी टिप्पणी की गई है, तो पुलिस अधीक्षक से यह स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा होगी कि उक्त शब्दावली किस आधार पर इस्तेमाल की गई और क्या वरिष्ठ स्तर पर इसकी अनुमति या समीक्षा हुई थी।
फिलहाल पूरे मामले में पुलिस प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण है।

 

 

नोट: इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोप/आपत्तियां संबंधित प्रेस नोट और उपलब्ध दावों के आधार पर उठाए गए सवालों के रूप में प्रस्तुत हैं। किसी व्यक्ति या अधिकारी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट से नहीं की जा रही है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Related News

September 28, 2026

September 28, 2026

September 28, 2026

September 27, 2026

September 27, 2026

September 27, 2026

Leave a Comment