Rewa MP शासकीय ज़मीन पर निजी मुनाफ़ा? श्रीयुत महाविद्यालय की भूमि के सवाल पर मचा बवाल,,
रीवा। जिले के मनगवां विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मढ़ीकला, जनपद पंचायत गंगेव में संचालित श्रीयुत महाविद्यालय की आराजी को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और यह मामला अब स्थानीय दायरे से बाहर निकलकर सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुका हैं। जन चर्चा और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उच्च शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त श्रीयुत महाविद्यालय के बारे में दावा किया जा रहा है कि यह शासकीय भूमि पर संचालित है जबकि अभी तक लोगों को यह पता था कि निजी महाविद्यालय निजी आराजी में संचालित है लेकिन जब से शासकीय भूमि पर निजी महाविद्यालय संचालित होने की बात सामने आने लगी तब से महाविद्यालय की निजी प्रबंधन और कथित भारी शुल्क वसूली पर प्रश्न चिन्ह खड़े होने लगे हैं।देखा जाए तो गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए सरकार छात्रवृत्ति और निःशुल्क शिक्षा की योजनाओं का प्रचार करती है, तो वहीं दूसरी ओर यदि सरकारी संपत्ति पर निजी वसूली का तंत्र पनपता है, तो यह सामाजिक न्याय की अवधारणा को कमजोर करता है।
इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब मनगवां के विधायक इंजी नरेन्द्र प्रजापति ने महाविद्यालय की भूमि संबंधी विस्तृत जानकारी मांगी तब से यह मामला केवल कागज़ी औपचारिकता तक नहीं बल्कि उस बड़ी बहस और सवाल की शुरुआत कर चुका है जिसमें सरकारी संसाधनों पर निजी लाभ के खेल का खुलासा हुआ है।
शासकीय जमीन पर संचालित निजी महाविद्यालय को लेकर विधायक द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि महाविद्यालय को शासनाधीन कर दिया जाए, तो गरीब छात्रों को निःशुल्क या न्यूनतम शुल्क पर शिक्षा मिल सकती है, इसके साथ ही कर्मचारियों को नियमित सेवा शर्तें मिल सकती हैं, और कथित आर्थिक वसूली पर रोक लग सकती है।
सूत्रों के अनुसार, लगभग 22 एकड़ से अधिक की आराजी शासकीय बताई जा रही है जहां निजी महाविद्यालय में छात्रों और अभिभावकों से भारी शुल्क वसूले जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। यदि यह संस्थान वास्तव में शासकीय भूमि पर खड़ा है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नीति और नैतिकता दोनों पर प्रश्न है और सरकारी जमीन पर खड़ा संस्थान निजी शुल्क संरचना से संचालित हो, जो दोहरे मानदंड को दर्शाता है। इसके साथ ही जो सवाल उठते हैं उसमें यदि भूमि शासकीय है, तो निजी संस्था को संचालन की अनुमति किन शर्तों पर दी गई? क्या भूमि आवंटन प्रक्रिया पारदर्शी थी? क्या सरकार को राजस्व या लीज़ शुल्क प्राप्त हो रहा है? गरीब छात्रों से ली जा रही फीस का नियमन किसके हाथ में है?
अब यह मामला केवल एक महाविद्यालय का नहीं, बल्कि उस व्यापक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें सरकारी संसाधनों के उपयोग और शिक्षा के बाजारीकरण के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। यदि शासकीय भूमि पर निजी लाभ का मॉडल स्थापित होता है, तो यह भविष्य में अन्य संस्थानों के लिए भी एक खतरनाक उदाहरण बनेगा ऐसे में अब प्रशासन को इस पूरे मामले को सार्वजनिक तौर पर खुलासा करना चाहिए कि भूमि शासकीय है या फिर निजी है जिसमें श्रीयुत महाविद्यालय संचालित है।





