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Rewa MP:विकास के नाम पर तमाशा जारी “फीता काटो, फोटो खिंचवाओ, जनता की समस्याओं को भूल जाओ!

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🕒 Updated: 08 Jul 2026, 07:02 AM

Rewa MP:विकास के नाम पर तमाशा जारी “फीता काटो, फोटो खिंचवाओ, जनता की समस्याओं को भूल जाओ!

 

 

 

यही नया विकास मॉडल है!”गरीब सुविधाएं ढूंढ रहा है, सत्ता सेल्फी में विकास खोज रही है”अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, रोजगार नहीं, सड़क नहीं, पानी नहीं लेकिन विकास विश्वस्तरीय है!”

रीवा। रीवा समाचार देश के लोकतंत्र में विकास की परिभाषा अब पूरी तरह बदल चुकी है। 21वीं सदी के तीसरे दशक में जनता को धीरे-धीरे यह समझा दिया गया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छ पेयजल, बिजली, सड़क, नाली और अन्य बुनियादी सुविधाओं को विकास मानना अब पुरानी सोच की निशानी है। आधुनिक राजनीतिक विज्ञान के नए संस्करण में इन विषयों को विकास की सूची से सम्मानपूर्वक बाहर कर दिया गया है। अब विकास वह है जो मंच पर दिखाई दे, पोस्टरों में चमके, सोशल मीडिया पर ट्रेंड करे, चुनावी भाषणों में गूंजे और उद्घाटन समारोह में तालियां बटोरे। विकास वह है जिसके सामने फीता काटा जा सके, जिसका शिलान्यास किया जा सके और जिसकी तस्वीरें बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर लगाई जा सकें। इसके बाद शहर की गलियों में कीचड़ है या गांवों में सड़क गायब है, मोहल्लों में नालियां उफन रही हैं या लोग पीने के पानी के लिए भटक रहे हैं, बिजली आंख-मिचौली खेल रही है या अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी है इन सबका विकास से कोई सीधा संबंध नहीं माना जाता। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष, नगर परिषद अध्यक्ष, पार्षद और सरपंच तक सभी यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि जनता को क्या दिखाना है। इसलिए विकास अब नेशनल हाईवे के किनारे दिखाई देता है विशाल भवनों में, चमचमाते शॉपिंग कॉम्प्लेक्सों में, आलीशान होटलों में, नए बारों में, भव्य ओवरब्रिजों में, चौड़ी सड़कों में और रंग-बिरंगे पार्कों में। शहर और गांव के भीतर की टूटी गलियां, बदहाल सड़कें, गंदे नाले, पेयजल संकट और बिजली की समस्याएं शायद विकास के नक्शे में दर्ज ही नहीं हैं। क्योंकि इनके साथ न तो आकर्षक फोटो खिंचवाई जा सकती है और न ही इनके सामने खड़े होकर विकास के दावे किए जा सकते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि किसी मोहल्ले में साल भर नालियां जाम रहें, बरसात में घरों में पानी भर जाए, अस्पतालों में डॉक्टर न हों, स्कूलों में शिक्षक न हों और युवा डिग्रियां लेकर बेरोजगारी की कतार में खड़े हों, तो इससे विकास पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। आखिर ये समस्याएं कैमरे में उतनी सुंदर नहीं दिखतीं जितनी एक नई सड़क, नया भवन या नया पुल दिखता है। रोजगार की स्थिति यह है कि लाखों रुपये खर्च कर पढ़े-लिखे युवा डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं, लेकिन यह चिंता का विषय नहीं है। आखिर बेरोजगारी की तस्वीरें होर्डिंग्स पर थोड़े ही लगाई जा सकती हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की उपलब्धियां भी कम नहीं हैं। अस्पतालों की इमारतें भव्य हैं, मशीनें आधुनिक हैं, लेकिन कई मरीजों का मानना है कि बीमारी से ज्यादा दर्द जांच और इलाज के बिल देखकर होता है। फिर भी सब कुछ ठीक माना जाता है, क्योंकि भवन शानदार दिख रहा है। महंगाई पर चर्चा करना तो लगभग असभ्यता की श्रेणी में पहुंच चुका है। रसोई गैस, दाल, तेल, सब्जियों और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें चाहे आसमान छू लें, लेकिन जनता को सलाह दी जाती है कि वह इन विषयों पर कम और विकास के चमकदार मॉडलों पर ज्यादा ध्यान दे। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि आज विकास का सबसे बड़ा पैमाना यह है कि किसी परियोजना के उद्घाटन में कितनी कुर्सियां लगीं, मंच कितना बड़ा था, कितने नेताओं ने भाषण दिए और सोशल मीडिया पर कितनी तस्वीरें पोस्ट हुईं। जनता की सुविधा बाद में देखी जाएगी, पहले विकास की फोटो अच्छी आनी चाहिए। उधर बड़े निर्माण कार्यों से जुड़े वर्गों में उत्साह का माहौल है। करोड़ों के प्रोजेक्ट, लगातार होने वाले भूमिपूजन, आकर्षक घोषणाएं और चमकदार प्रस्तुतियां विकास की गंगा बहा रही हैं। आंकड़े मजबूत हैं, पोस्टर आकर्षक हैं और भाषण प्रभावशाली हैं, फिर विकास पर सवाल कैसा…? जलभराव से परेशान नागरिकों को भी नया प्रशासनिक दर्शन समझाया जा रहा है। उन्हें बताया जाता है कि बरसात खत्म होते ही पानी अपने आप निकल जाएगा, इसलिए इसे समस्या नहीं बल्कि “मौसमी विकास योजना” का हिस्सा माना जाना चाहिए। विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में विकास की सूची में और भी कई चमकदार चीजें जुड़ेंगी। वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छ पेयजल और बुनियादी सुविधाएं इतिहास की पुस्तकों में “पुराने जमाने के विकास मॉडल” के रूप में पढ़ाई जाएंगी। फिलहाल जनता से अनुरोध है कि गड्ढों, जलभराव, बेरोजगारी, बदहाल शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की समस्याओं को कुछ देर के लिए भूल जाएं। किसी नए ओवरब्रिज, भवन या पार्क के सामने सेल्फी लें और गर्व से लिखें ” देखो कितना विकास हुआ है!”

 

 

नोट-यह लेख पूर्णतः व्यंग्यात्मक है। इसका उद्देश्य जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा और चिंतन को प्रोत्साहित करना है।

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