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Delhi news:CEC ज्ञानेश कुमार पर 20 साल पुराने रिश्वत कांड की जांच को मंजूरी, ₹2 करोड़ मांगने का आरोप; केरल सरकार के फैसले से बढ़ी हलचल!

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🕒 Updated: 05 Nov 2026, 02:02 AM

Delhi news:CEC ज्ञानेश कुमार पर 20 साल पुराने रिश्वत कांड की जांच को मंजूरी, ₹2 करोड़ मांगने का आरोप; केरल सरकार के फैसले से बढ़ी हलचल!

 

 

 

करीब ₹17 करोड़ के ठेकेदार के बिल भुगतान से जुड़ा है मामला, तत्कालीन PWD सचिव पर रिश्वत मांगने का आरोप। पहले बंद हो चुकी जांच अब नई शिकायत के बाद फिर चर्चा में। SIR विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल।

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से जुड़ा करीब दो दशक पुराना कथित रिश्वत प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में है। केरल सरकार ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और कथित अनियमितताओं के आरोपों की जांच के लिए विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) को अनुमति दे दी है। मामला वर्ष 2006 का बताया जा रहा है, जब ज्ञानेश कुमार केरल में लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव के पद पर पदस्थ थे।

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि सड़क निर्माण परियोजना का काम पूरा होने और करीब 17 करोड़ रुपये के बिल मंजूर होने के बावजूद भुगतान जारी करने के बदले कथित तौर पर 2 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। हालांकि, यह आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच और कानूनी प्रक्रिया के जरिए पुष्टि होना अभी बाकी है।

केरल सरकार की ओर से जांच की अनुमति दिए जाने के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि करीब 20 साल पुराने इस मामले में पहले हुई जांच में क्या छूट गया था और क्या नई जांच में उन तथ्यों की पड़ताल हो पाएगी, जिनका उल्लेख शिकायतकर्ता ने किया है?

 

 

 

 

 ₹2 करोड़ की रिश्वत का आरोप: क्या है पूरा मामला?

विवाद की जड़ केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KSTP) के तहत मेन सेंट्रल रोड (MC Road) के निर्माण और उन्नयन का काम है। इस परियोजना का ठेका भारत-मलेशिया के संयुक्त उपक्रम PATI-BEL को दिया गया था। परियोजना से जुड़े मलेशियाई इंजीनियर ली सी बीन (Lee See Been) मुख्य प्रोजेक्ट मैनेजर थे।

शिकायतकर्ता और ठेकेदार वी.ओ. साजन का आरोप है कि परियोजना के तहत कंपनी के लगभग 17 करोड़ रुपये के बिल इंजीनियरों द्वारा मंजूर किए जा चुके थे, लेकिन भुगतान के चेक जारी नहीं हो रहे थे। साजन के मुताबिक, तत्कालीन PWD सचिव ज्ञानेश कुमार ने भुगतान जारी करने के एवज में ली सी बीन से 2 करोड़ रुपये की कथित रिश्वत मांगी थी।

मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। वर्ष 2006 में ली सी बीन की मलेशिया में आत्महत्या हो गई थी। साजन का दावा है कि इंजीनियर ने अपने कथित सुसाइड नोट में रिश्वत मांगने से जुड़ी बातों का उल्लेख किया था। हालांकि, कथित सुसाइड नोट सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है और इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

 

 

 

 

पहले पांच साल चली जांच, फिर भी नहीं साबित हुए आरोप

यह मामला पहली बार सामने आने के बाद वर्ष 2007 से 2012 के बीच विजिलेंस की जांच के दायरे में रहा था। उस समय परियोजना से संबंधित भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की पड़ताल की गई थी।

लेकिन पिछली जांच में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण आगे की कार्रवाई नहीं की गई। वर्ष 2012 में कुछ मामलों को अदालत में ‘मिस्टेक ऑफ फैक्ट’ रिपोर्ट के साथ पेश किया गया था, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था।

अब शिकायतकर्ता साजन ने पुरानी जांच पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि जांच के दौरान उनसे और परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण लोगों से पूछताछ ही नहीं की गई। उन्होंने जांच एजेंसी को संबंधित लोगों और संभावित साक्ष्यों की जानकारी देने की पेशकश भी की है।यही वजह है कि अब दो दशक पुराने इस प्रकरण में दोबारा जांच की मांग ने जोर पकड़ लिया है।

 

 

 

मंत्री रमेश चेन्निथला ने क्यों दी जांच की मंजूरी?

केरलम के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने 4 नवंबर को मीडिया से बातचीत में जांच की अनुमति दिए जाने की जानकारी दी। उनके मुताबिक, विजिलेंस विभाग ने शिकायत और कथित कदाचार की जांच के लिए सरकार से अनुमति मांगी थी।

इस पर कानूनी राय ली गई। कानूनी सलाह के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत जांच की मंजूरी दी गई।

इस फैसले का कानूनी महत्व इसलिए भी है क्योंकि ज्ञानेश कुमार वर्तमान में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर हैं। हालांकि, आरोप उनके वर्तमान पद से जुड़े नहीं, बल्कि केरल में तत्कालीन PWD सचिव के रूप में उनके कार्यकाल के हैं।

अब विजिलेंस की जांच में शिकायतकर्ता के दावों, पुराने दस्तावेजों, भुगतान संबंधी रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयानों की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।

 

 

 

SIR विवाद के बीच CEC पर बढ़ा राजनीतिक दबाव

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पुराने रिश्वत प्रकरण की जांच ऐसे समय में आगे बढ़ी है, जब देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच टकराव जारी है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इसके जरिए पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने के लिए पुनरीक्षण आवश्यक है।

1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली में भी चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी नेताओं ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी। ऐसे राजनीतिक माहौल में केरल सरकार का यह फैसला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

 

 

 

अब सबसे बड़ा सवाल: क्या जांच में सामने आएगा सच?

इस पूरे प्रकरण में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच की अनुमति मिलना किसी व्यक्ति के दोषी साबित होने के बराबर नहीं है। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए ₹2 करोड़ रिश्वत मांगने के आरोपों की पुष्टि अभी नहीं हुई है।

लेकिन दो दशक पुराने मामले में नई शिकायत, पिछली जांच पर उठे सवाल और केरल सरकार की ताजा मंजूरी ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं।

* क्या वास्तव में 17 करोड़ रुपये के भुगतान के बदले 2 करोड़ रुपये की मांग की गई थी?

* क्या तत्कालीन जांच में महत्वपूर्ण गवाहों और दस्तावेजों की अनदेखी हुई थी?

* क्या कथित सुसाइड नोट और इंजीनियर की मौत से जुड़े तथ्यों की दोबारा पड़ताल होगी?

* क्या विजिलेंस की नई जांच पुराने मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला पाएगी?

फिलहाल निगाहें विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो की जांच पर टिकी हैं। जांच के निष्कर्ष ही तय करेंगे कि इन गंभीर आरोपों में कितनी सच्चाई है।

एक तरफ देश की चुनावी व्यवस्था की सर्वोच्च जिम्मेदारी संभाल रहे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं, तो दूसरी तरफ उनके पुराने प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़ा कथित रिश्वत प्रकरण। अब देखना होगा कि जांच एजेंसी दो दशक पुराने इस विवाद की परतें खोल पाती है या नही।

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