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‘कैमरों के सामने दिखावा बंद करो’, CJI सूर्यकांत ने न्याय सुधार याचिकाकर्ता को दी चेतावनी

‘कैमरों के सामने दिखावा बंद करो’, CJI सूर्यकांत ने न्याय सुधार याचिकाकर्ता को दी चेतावनी
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🕒 Updated: 23 Jan 2026, 09:33 AM

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक सुधारों के लिए समिति बनाने, हर मामले का 12 महीनों में निपटान करने और कुछ खास मामलों की जांच कराने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस ने इस याचिका को साफ तौर पर ‘प्रचार-प्रसार’ की कोशिश बताया और कहा कि कोर्ट के पास इस तरह के मामलों के लिए नहीं आना चाहिए। उन्होंने याचिकाकर्ता से कड़े शब्दों में कहा, “हम किसी को भी ‘न्यायिक सुधारों’ के नाम पर यहां नहीं आने देंगे। अगर आपके पास सुधार के लिए सुझाव हैं तो पहले लिखित में भेजें। फिर मैं देखूंगा कि इसे लागू किया जा सकता है या नहीं। हम खुद यहां हैं, हम करेंगे।”

‘पत्र भेजिए, याचिका की क्या जरूरत?’—चीफ जस्टिस का स्पष्ट संदेश

चीफ जस्टिस ने सीधे याचिकाकर्ता से कहा कि अगर देश में बदलाव लाना चाहते हैं तो ऐसे याचिका दाखिल करने की जरूरत नहीं है। बस एक पत्र लिखकर भेज दें। उन्होंने कहा, “देश में बदलाव लाना है तो याचिका दाखिल करने की कोई जरूरत नहीं… बस पत्र लिखिए और भेज दीजिए।” उन्होंने इस बात पर भी निराशा जताई कि लोग कैमरों के सामने बोलने के लिए इस तरह की याचिकाएं दाखिल करते हैं। सूर्यकांत ने कहा, “ऐसी याचिकाएं सिर्फ कैमरों के सामने बोलने के लिए न दाखिल करें।”

याचिका में मिली-जुली और असंबंधित मांगों को लेकर कोर्ट का सख्त रुख

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिका में कई असंबंधित मुद्दों को एक साथ जोड़ दिया गया है, जो सही नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता प्रशासनिक सुधारों के सुझाव देना चाहते हैं तो वे सीधे चीफ जस्टिस को लिखित में भेज सकते हैं। कोर्ट ने कहा, “ऐसे सुझाव हमेशा स्वागत योग्य हैं।” यह स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका प्रशासनिक सुधारों को लेकर सुझावों के लिए हमेशा खुले हैं, लेकिन उन्हें उचित प्रक्रिया के तहत ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

हर मामले का 12 महीने में निपटान करने की मांग पर तीखी टिप्पणी

याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि हर कोर्ट को हर मामले में एक साल के भीतर फैसला देना चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने व्यंग्यात्मक अंदाज में जवाब दिया, “आप कह रहे हैं कि हर कोर्ट को एक साल में फैसला देना चाहिए? कितनी ऐसी अदालतें चाहिए आपको?” यह जवाब दर्शाता है कि न्यायपालिका इस तरह की अतिशयोक्ति वाली मांगों को गंभीरता से नहीं लेती और मामला निपटान की वास्तविक चुनौतियों को भी समझती है।

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