MP news:राजनीति में दोस्ती केवल मंचों की मुस्कान से नहीं चलती,वह वर्षों के भरोसे, संकट के समय निभाए गए साथ और सत्ता के भीतर बने अदृश्य समीकरणों से बनती है।
कांग्रेस की राजनीति में अगर ऐसे रिश्तों की बात की जाए, तो अशोक गेहलोत , कमल नाथ और दिग्विजय सिंह का नाम हमेशा अलग तरीके से लिया जाता है।
यह केवल तीन नेताओं का संबंध नहीं था, बल्कि कांग्रेस संगठन के भीतर दशकों से चल रही उस समझ का हिस्सा था जिसमें एक-दूसरे को आगे बढ़ाना भी राजनीति का हिस्सा माना जाता रहा।
2018 का साल कांग्रेस के लिए निर्णायक था।
राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ — तीनों राज्यों में भाजपा को चुनौती देने की तैयारी चल रही थी।
कांग्रेस लंबे समय बाद सत्ता में वापसी का सपना देख रही थी।
लेकिन इन चुनावों के पीछे केवल जनता की नाराज़गी नहीं थी, बल्कि संगठन के भीतर नेताओं के बीच बने समीकरण भी बहुत महत्वपूर्ण थे।
राजस्थान में चुनाव खत्म हुए तो मुख्यमंत्री पद की सबसे बड़ी लड़ाई Sachin Pilot और अशोक गहलोत के बीच दिखाई दी।
सचिन पायलट युवा चेहरा थे, कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय थे और उन्होंने राजस्थान में कांग्रेस को खड़ा करने के लिए वर्षों मेहनत की थी।
दूसरी तरफ अशोक गहलोत थे — शांत, अनुभवी, संगठन के खिलाड़ी और दिल्ली दरबार की राजनीति को गहराई से समझने वाले नेता।
उस समय कांग्रेस के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि राजस्थान जैसा संवेदनशील राज्य अनुभव के हाथ में रहना चाहिए।
यहीं पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की भूमिका चर्चा में आई।
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में लंबे समय तक यह बात कही जाती रही कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का एक बड़ा वर्ग अशोक गहलोत के पक्ष में था।
कमलनाथ और दिग्विजय सिंह भी उन नेताओं में माने गए जो गहलोत के अनुभव और संगठनात्मक क्षमता को मुख्यमंत्री पद के लिए बेहतर विकल्प मानते थे।
यह समर्थन केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं था।
कांग्रेस में मुख्यमंत्री तय करना केवल विधायक दल की बैठक से नहीं होता।
दिल्ली के भीतर कई स्तरों पर राय बनती है।
कौन सरकार संभाल सकता है, कौन विधायकों को साथ रख सकता है, कौन संकट में पार्टी नहीं छोड़ेगा, कौन संगठन से टकराव नहीं करेगा — इन सभी बातों का मूल्यांकन होता है।
अशोक गहलोत उस समय संगठन के राष्ट्रीय महासचिव भी थे।
उनकी पकड़ केवल राजस्थान तक सीमित नहीं थी।
वे उन नेताओं में थे जिनकी बात दिल्ली गंभीरता से सुनती थी।
जब राजस्थान में गहलोत मुख्यमंत्री बने, उसी समय मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस के भीतर सत्ता संघर्ष चल रहा था।
यहाँ मुकाबला सबसे ज्यादा कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच माना जा रहा था।
सिंधिया युवा थे, लोकप्रिय थे, आक्रामक प्रचार कर रहे थे।
लेकिन कमलनाथ के पास संगठन, अनुभव और दिल्ली की राजनीति की गहरी समझ थी।
दिग्विजय सिंह उस समय खुद मुख्यमंत्री की दौड़ में सामने नहीं थे, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं था कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में उनका प्रभाव बहुत बड़ा था।
सरकार बनाने की रणनीति से लेकर विधायकों को साथ रखने तक, हर जगह उनकी भूमिका महसूस की जा रही थी।
इसी समय अशोक गहलोत की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई।
कांग्रेस संगठन में राष्ट्रीय महासचिव होने के कारण वे उन चर्चाओं और फैसलों का हिस्सा थे जिनमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का नाम तय हो रहा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा कि गहलोत ने भी कमलनाथ के पक्ष में माहौल बनाने में भूमिका निभाई।
यह राजनीति का एक दिलचस्प अध्याय था।
राजस्थान में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने गहलोत के अनुभव पर भरोसा जताया।
और मध्यप्रदेश में गहलोत ने कमलनाथ के पक्ष को मजबूत करने में सहयोग किया।
यही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का वह चेहरा है जो मंचों पर दिखाई नहीं देता।
यहाँ समर्थन सार्वजनिक भाषणों से कम और बंद कमरों की बैठकों में ज्यादा तय होता है।
मध्यप्रदेश में आखिरकार कमलनाथ मुख्यमंत्री बने।
सिंधिया समर्थकों को यह फैसला पूरी तरह स्वीकार नहीं था।
उनका मानना था कि जनता के बीच सबसे ज्यादा मेहनत सिंधिया ने की थी।
लेकिन कांग्रेस हाईकमान का झुकाव अनुभव की राजनीति की ओर ज्यादा दिखाई दिया।
यह वही दौर था जब कांग्रेस के भीतर “वरिष्ठ बनाम युवा” की बहस लगातार तेज हो रही थी।
एक तरफ राहुल गांधी युवा नेतृत्व को आगे लाने की बात करते थे, दूसरी तरफ राज्यों में अंततः अनुभव वाले नेताओं को सत्ता दी जा रही थी।
कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे दो हिस्सों में बंटती चली गई।
एक तरफ कमलनाथ-दिग्विजय सिंह का मजबूत संगठनात्मक ढांचा था।
दूसरी तरफ सिंधिया समर्थक विधायक और नेता थे, जिन्हें लगने लगा कि उनकी राजनीतिक जमीन सीमित की जा रही है।
2019 का लोकसभा चुनाव इस संघर्ष को और गहरा कर गया।
कांग्रेस बुरी तरह हार गई।
सिंधिया अपनी गुना सीट तक हार गए।
इसके बाद उनके समर्थकों में बेचैनी और बढ़ गई।
उसी समय कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव हुआ।
अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री बन चुके थे और संगठन में नई नियुक्तियाँ हुईं।
K. C. Venugopal संगठन महासचिव बने।
लेकिन राजनीतिक समीकरणों में एक बात नहीं बदली — दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और गहलोत के बीच बना भरोसा।
यह वही राजनीतिक धारा थी जो कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक नियंत्रण बनाए हुए थी।
कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि सिंधिया को लगने लगा था कि कांग्रेस में भविष्य की सत्ता संरचना उनके अनुकूल नहीं बन रही।
प्रदेश अध्यक्ष पद की चर्चाएँ हुईं, लेकिन शायद बात केवल पद की नहीं रह गई थी।
उन्हें सत्ता में निर्णायक भूमिका चाहिए थी।
2020 का राज्यसभा चुनाव इस पूरे संघर्ष का अंतिम मोड़ साबित हुआ।
सिंधिया को उम्मीद थी कि उन्हें राज्यसभा भेजा जाएगा।
लेकिन कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह और फूल सिंह बरैया को उम्मीदवार बनाया।
राजनीतिक संदेश साफ था।
संगठन का भरोसा अब भी पुराने नेतृत्व पर था।
इसके बाद जो हुआ, उसने मध्यप्रदेश की राजनीति बदल दी।
सिंधिया भाजपा में चले गए।
22 विधायक साथ चले गए।
कमलनाथ सरकार गिर गई।
लेकिन इस पूरी कहानी में एक बात हमेशा चर्चा में रही —
कांग्रेस के भीतर वरिष्ठ नेताओं का वह नेटवर्क, जिसने वर्षों तक संगठन और सत्ता दोनों को संतुलित करके रखा।
अशोक गहलोत, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह केवल अलग-अलग राज्यों के नेता नहीं थे।
वे उस कांग्रेस संस्कृति का हिस्सा थे जिसमें व्यक्तिगत संबंध राजनीति से भी बड़े हो जाते हैं।
राजस्थान में गहलोत का मुख्यमंत्री बनना केवल विधायक संख्या का खेल नहीं था।
मध्यप्रदेश में कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना भी केवल चुनाव परिणाम का फैसला नहीं था।
इन दोनों फैसलों के पीछे कांग्रेस संगठन की पुरानी राजनीति, आपसी भरोसा और वरिष्ठ नेताओं की सामूहिक रणनीति काम कर रही थी।
आज जब लोग 2018 और 2020 की राजनीति को देखते हैं, तो उन्हें केवल सरकार गिरने और बनने की कहानी दिखाई देती है।
लेकिन अंदर से देखें तो यह कांग्रेस के भीतर दो विचारों की लड़ाई थी।
एक विचार कहता था कि अनुभव ही संगठन को बचा सकता है।
दूसरा मानता था कि नई पीढ़ी को समय रहते सत्ता देनी चाहिए।
अंत में अनुभव जीत गया,
लेकिन शायद उसी जीत की कीमत कांग्रेस ने बाद में सरकार खोकर चुकाई।





