Mauganj MP:मऊगंज की पंचायतों में विकास कागजों में कैद!
शौचालय से अमृत सरोवर तक अधूरे कामों पर सवाल, वेंडरों के जरिए भुगतान का आरोप; शिकायत की जांच पर भी उठी उंगली
मऊगंज। ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी राशि और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर होने के आरोप सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायतों में कई योजनाएं फाइलों में पूर्ण दिखाई जा रही हैं, जबकि मौके पर काम अधूरे या बदहाल नजर आते हैं। इससे पंचायत स्तर पर निगरानी व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव के विकास की पूरी तस्वीर कागजों में तैयार कर दी जाती है। फाइलों में निर्माण कार्य पूर्ण दिखाए जाते हैं, बिल-वाउचर तैयार होते हैं और भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ जाती है, लेकिन जब मौके पर जाकर हकीकत देखी जाती है तो कई कार्य अधूरे, अनुपयोगी या निर्धारित मापदंड के अनुरूप नहीं मिलने के आरोप हैं।
शौचालय से अमृत सरोवर तक—कागजों में पूर्ण, मौके पर सवाल
ग्रामीणों ने पंचायतों में शौचालय निर्माण, सार्वजनिक शौचालय, नाली निर्माण, खेत तालाब, मेढ़बंधन, अमृत सरोवर, खेल मैदान के रखरखाव, पीसीसी सड़क, पंचायत भवन, सोक्ता निर्माण और सोलर लाइट जैसे कार्यों की गुणवत्ता एवं पूर्णता पर सवाल उठाए हैं।
आरोप है कि कुछ स्थानों पर काम अधूरे पड़े हैं, तो कहीं निर्माण होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो रहा। वहीं कुछ सोलर लाइटें बंद पड़ी होने की शिकायत भी ग्रामीणों ने की है।
ग्रामीणों का सीधा सवाल है—यदि काम वास्तव में पूर्ण हैं तो फिर मौके पर उनकी स्थिति अलग क्यों दिखाई देती है?
वेंडरों के भुगतान को लेकर भी उठे सवाल
पंचायतों में होने वाले विकास कार्यों के भुगतान की प्रक्रिया को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। आरोप है कि बिल-वाउचर और वेंडर के माध्यम से भुगतान की प्रक्रिया तो पूरी हो जाती है, लेकिन कार्य की वास्तविक गुणवत्ता और मौके पर उसकी उपयोगिता की निगरानी उतनी प्रभावी नहीं है।
ग्रामीणों की भाषा में कहें तो उनका आरोप है कि “विकास का फायदा गांव की जनता से ज्यादा वेंडरों को दिखाई दे रहा है।”
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में संबंधित पंचायतों के अभिलेख, माप पुस्तिका, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र, बिल-वाउचर और मौके की वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण होगी।
सबसे बड़ा सवाल—जिस पर आरोप, जांच भी उसी व्यवस्था के भरोसे?
ग्रामीणों की सबसे बड़ी आपत्ति शिकायतों की जांच प्रक्रिया को लेकर है। उनका कहना है कि जब पंचायत स्तर पर किसी कार्य में अनियमितता की शिकायत की जाती है, तो जांच और प्रतिवेदन की प्रक्रिया उसी विभागीय व्यवस्था के अधिकारियों के माध्यम से आगे बढ़ती है, जिनकी निगरानी में संबंधित विकास कार्य हुए हैं।
यहीं से ग्रामीणों का सवाल सामने आता है—अगर शिकायत विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर है, तो क्या उसी व्यवस्था से कराई गई जांच को पूरी तरह निष्पक्ष माना जा सकता है?
ग्रामीणों की मांग है कि गंभीर शिकायतों की जांच स्वतंत्र एवं वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों की टीम से मौके पर भौतिक सत्यापन कराकर कराई जाए, ताकि कागजी रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति का वास्तविक मिलान हो सके।
जनपद सीईओ की भूमिका पर भी उठे सवाल
पंचायतों में विकास कार्यों की निगरानी और शिकायतों के निराकरण को लेकर जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (CEO) की भूमिका पर भी ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं।
ग्रामीणों का दावा है कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। अब सवाल यह है कि शिकायतों के बाद कितने मामलों में मौके पर जाकर जांच हुई? कितने कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया गया? कितनी राशि का भुगतान हुआ और कितने कार्य वास्तव में निर्धारित मापदंडों के अनुसार पूरे हुए?
इन सवालों का जवाब सरकारी रिकॉर्ड और स्वतंत्र भौतिक सत्यापन से ही सामने आ सकता है।
अब कागज नहीं, मौके पर चाहिए विकास का हिसाब
मऊगंज की पंचायतों से उठ रही शिकायतों ने ग्रामीण विकास योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि सरकारी रिकॉर्ड में कार्य पूर्ण हैं, तो प्रशासन को संबंधित पंचायतों में मौके पर भौतिक सत्यापन कराकर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
ग्रामीणों की मांग है कि शौचालय से लेकर अमृत सरोवर, सड़क से लेकर पंचायत भवन और सोलर लाइट से लेकर नाली निर्माण तक सभी विवादित कार्यों का रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति का मिलान कराया जाए।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इन शिकायतों को महज एक और प्रतिवेदन मानकर फाइलों में रखता है या फिर कागजों में दर्ज विकास को धरातल पर जांचने के लिए निष्पक्ष जांच कराता है।
क्योंकि असली सवाल यही है—अगर विकास कागजों में पूरा है, तो गांव की जमीन पर अधूरा क्यों दिखाई दे रहा है?





