Mauganj MP:पशुपालन विभाग के प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर पर 14.70 लाख की कथित रिश्वतखोरी के आरोप!
गौशाला सत्यापन और अनुदान के बदले 50% कमीशन मांगने का दावा; बेटियों और परिचितों के खातों में रकम ट्रांसफर कराने, कोरे चेक और वीडियो साक्ष्यों का भी उल्लेख
मऊगंज। गौवंश संरक्षण और गौशालाओं के संचालन के लिए सरकार करोड़ों रुपये का बजट खर्च कर रही है, लेकिन मऊगंज जिले से सामने आई एक शिकायत ने पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग के प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर जे.एल. साकेत पर एक गौशाला संचालक ने करीब 14 लाख 70 हजार रुपये की कथित रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप लगाए हैं।
शिकायतकर्ता गौशाला संचालक संदीप शुक्ला के मुताबिक, गौशाला के सत्यापन और अनुदान भुगतान की प्रक्रिया के बदले कुल अनुदान राशि की करीब 50 प्रतिशत रकम कथित तौर पर कमीशन के रूप में मांगी जाती थी। आरोप है कि राशि नहीं देने पर भुगतान रोकने और सत्यापन के नाम पर दबाव बनाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता था।
बेटियों और खुद के खाते में रकम भेजने का आरोप
शिकायत में कथित लेन-देन के कई माध्यमों का उल्लेख किया गया है। आरोपों के अनुसार, प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर की बेटी रश्मि साकेत के खाते में 63,500 रुपये, दूसरी बेटी पूनम साकेत के खाते में 17,500 रुपये, जबकि स्वयं जे.एल. साकेत के खाते में 1,01,500 रुपये ऑनलाइन/PhonePe के माध्यम से भेजे जाने का दावा किया गया है।
इसके अलावा अटरिया इन्द्रदत्त स्थित फार्म हाउस पर 50 हजार रुपये नकद लेने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस कथित लेन-देन से संबंधित वीडियो फुटेज भी उपलब्ध है।
कोरे चेक से 5.50 लाख ट्रांसफर कराने का दावा
मामला यहीं नहीं रुकता। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गौशाला संचालन की शुरुआत के दौरान संदीप शुक्ला से एक कोरा चेक लिया गया था। बाद में कथित तौर पर उसी चेक में राशि भरकर प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर के परिचित सदानंद पाठक के खाते में 5 लाख 50 हजार रुपये ट्रांसफर कराए गए।
एक अन्य आरोप 7 लाख रुपये के चेक से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार यह राशि रामउजागर अवधिया के नाम से भुनाई गई। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि इसी रकम से रीवा में प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर के बेटे पुनीत कुमार साकेत के नाम पर मकान खरीदा गया। इस दावे के समर्थन में रजिस्ट्री दस्तावेज में कथित रूप से दर्ज चेक नंबर का भी हवाला दिया गया है।
फर्जी शपथपत्र तैयार कराने का भी आरोप
शिकायतकर्ता ने एक कथित शपथपत्र को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि अनुबंध पत्र में इस्तेमाल स्टाम्प का कथित रूप से दुरुपयोग करते हुए ऐसा शपथपत्र तैयार किया गया, जिसमें यह दर्शाया गया कि संदीप शुक्ला ने सदानंद पाठक से भूसा खरीदा था।
यदि दस्तावेजों और लेन-देन की स्वतंत्र जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल कथित रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दस्तावेजों के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं की जांच का विषय भी बन सकता है।
पहले भी लग चुके हैं गंभीर आरोप
शिकायत में यह भी कहा गया है कि जे.एल. साकेत पर इससे पहले भी उनकी बेटी रश्मि साकेत के खाते में 2 हजार रुपये कथित रिश्वत के रूप में लेने और गौशालाओं में वास्तविक संख्या से अधिक गौवंश दर्शाकर सरकारी राशि में कथित अनियमितता के आरोप लगाए जा चुके हैं।
समाजसेवी कुंजबिहारी तिवारी द्वारा इस संबंध में मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्य सचिव, भोपाल को शिकायतें भेजे जाने का भी दावा किया गया है। शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, मामले को लेकर धरना-प्रदर्शन और अन्य आंदोलन भी किए जा चुके हैं।
बैंक रिकॉर्ड से लेकर वीडियो तक—जांच की मांग
इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता पक्ष ने कथित बैंक लेन-देन, PhonePe ट्रांजैक्शन, चेक की प्रतियां/क्रमांक, रजिस्ट्री दस्तावेज, कथित शपथपत्र और वीडियो फुटेज जैसे साक्ष्य होने का दावा किया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच कब और किस एजेंसी से कराई जाएगी? यदि बैंक रिकॉर्ड में बताए गए लेन-देन की पुष्टि होती है, तो इन रकमों का वास्तविक उद्देश्य क्या था और संबंधित व्यक्तियों के बीच इनका क्या संबंध था—यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु होगा।
आरोप सही हैं या नहीं, जांच से होगा साफ
पशुपालन विभाग के प्रभारी डिप्टी डायरेक्टर जे.एल. साकेत पर लगाए गए आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता के दावों और उपलब्ध बताए जा रहे दस्तावेजों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बाद ही इनकी सत्यता स्पष्ट हो सकेगी। संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना आवश्यक होगा।
फिलहाल मामला शासन और प्रशासन के लिए इसलिए भी गंभीर है क्योंकि आरोप सीधे गौशाला सत्यापन, सरकारी अनुदान और कथित कमीशनखोरी से जुड़े हैं। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की आवश्यकता होगी।
अब निगाह इस बात पर है कि मुख्यमंत्री कार्यालय और जिला प्रशासन तक पहुंची शिकायत तथा कथित वित्तीय एवं डिजिटल साक्ष्यों पर शासन क्या कदम उठाता है—निष्पक्ष जांच होती है या मामला एक और शिकायत बनकर फाइलों में दब जाता है।





