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MP news:संजय के सास की सिफारिश पर सीएम बने थे अर्जुन सिंह

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🕒 Updated: 12 May 2026, 01:02 PM

MP news:संजय के सास की सिफारिश पर सीएम बने थे अर्जुन सिंह

 

 

 

मध्यप्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री मोहन यादव को पर्ची सीएम कहा जाता है.. लोग कहते हैं वो विधायकों के समर्थन से नहीं दिल्ली से आई पर्ची से सीएम बने.. इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन एमपी में शायद ही कोई मुख्यमंत्री विधायकों की मर्जी पर बना हो… अगर पर्ची चली भी तो पहली बार नहीं….. मध्यप्रदेश की सियासत में अब तक के सबसे ताकतवर नेता रहे अर्जुन सिंह भी पहली बार दिल्ली की पर्ची पर ही सीएम बने थे.. अन्यथा तब विधायकों का समर्थन आदिवासी नेता शिवभानु सिंह सोलंकी के पास था… विधायकों के समर्थन के बाद भी सीएम की कुर्सी न मिलने पर सोलंकी ने यहाँ तक कह दिया था कि ‘कांग्रेस ने आदिवासी के सामने से परोसी थाली छीन ली..

 

 

 

 

अर्जुन सिंह के पर्ची से मुख्यमंत्री बनने की कहानी पर आगे बढ़ें इससे पहले उससे पहले के मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर सरसरी निगाह डाल लेते हैं. 1 नवंबर 1956 को माध्यप्रदेश बना…रविशंकर शुक्ल शुक्ला पहले मुख्यमंत्री बने. 1 नवम्बर 1956 को शपथ ली.. 31 दिसम्बर 1956 को उनका निधन हो गया… इसके बाद भगवंतराव मंडलोइ 9 जनवरी 1957 से 31 जनवरी 1957 यानि कुल 22 दिन सीएम रहे फिर नेहरू जी के साथी.कैलाश नाथ काटजू आए. 14 मार्च 1957 से 12 मार्च 1962 तक सीएम रहे और सीएम रहते चुनाव हार गए… फिर भगवंतराव मंडलोई 12 मार्च 1962 से 30 सितम्बर 1963 तक सीएम रहे उनके बाद द्वारका प्रसाद मिश्र 8 मार्च 1967 से 30 जुलाई 1967 तक सीएम की कुर्सी पर बैठे.. फिर विजयाराजे सिंधिया ने उनकी सरकार गिरा दी.. कांग्रेस के बागियों -जनसंघियों की मिली -जुली संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी..गोविंद नारायण सिंह 30 जुलाई 1967 से 13 मार्च 1969 तक सीएम की कुर्सी पर बैठे फिर संविद सरकार गिरी नरेशचंद्र सिंह 13 मार्च 1969 से 26 मार्च 1969 तक सीएम रहे और इसके बाद आये श्यामा चरण शुक्ल जो 26 मार्च 1969 से 29 जनवरी 1972 तक सीएम रहे फिर उन्हें उठाकर इंदिरा के दरबारी प्रकाश चंद्र सेठी को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया गया..23 मार्च 1972 से 23मार्च 1975 तक उन्होंने भी सीएम की कुर्सी का सुख भोगा और फिर श्यामा चरण शुक्ल की वापसी हुई..23 दिसम्बर 1975 से 30 अप्रैल 1977 तक सीएम रहे और हटे तब ज़ब केंद्र मे जनता पार्टी की सरकार बनने पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.. कांग्रेस सरकार भंग कर दी गयी.. 30 अप्रैल 1977 से 23 जून 1977 तक राष्ट्रपति शासन रहा.. इसके बाद चुनाव हुए तो पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी… समाजवादियों और जनससंघियों के मिश्रण जनता पार्टी की..सीएम बने कैलाश जोशी लेकिन वो 18 घंटे सोते ही रहते थे.. 24 जून 1977 से 18 जनवरी 1978 तक ही सीएम की कुर्सी पर बैठ पाए.. उन्हें सोने के लिए फ्री कर दिया गया..उनकी जगह वीरेन्द्र कुमार सकलेचा आए. वो भी 18 जनवरी 1978 से 20 जनवरी 1980 तक ही रहे.. उन्हें उठाकर सुंदरलाल पटवा को बैठा दिया गया.. 20 जनवरी 1980 से 17 फ़रवरी 1980 तक ही वो सीएम रह पाए.. कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आई तो उसने 77 का बदला चुकाते हुए जनता पार्टी की सरकार को भंग कर दिया.17 फ़रवरी 1980 से 9 जून 1980 तक राष्ट्रपति शासन रहा और फिर चुनाव हुए तो कांग्रेस भारी बहुमत के साथ जीतकर आई.

 

 

 

 

कांग्रेस ने 320 में से 246 सीटें जीतीं..सीएम की कुर्सी के लिए कई कतार में थे..कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे शिवभानु सिंह सोलंकी और नेता प्रतिपक्ष अर्जुन सिंह.. छठवीं बार कांग्रेस की टिकट पर जीतकर आये. अर्जुन सिंह . सीएम बनने की जुगत में थे लेकिन ये इतना आसान न था. प्रकाश चंद्र सेठी, श्यामाचरण शुक्ला के साथ विद्याचरण शुक्ल पहले से ताक लगाए बैठे थे.. अर्जुन सिंह शुक्ला बंधुओं को किसी भी सूरत में सीएम नहीं बनने देना चाहते थे.. इसकी दो वजह थी एक तो इनके रहते उन्हें वेटिंग लिस्ट खत्म होती नहीं दिख रही थी.. दूसरे श्यामाचरण शुक्ला ने अपने दूसरे कार्यकाल में उन्हें मंत्री न बनाकर अपमानित किया था.. अर्जुन सिँह डीपी मिश्रा, श्यामाचरण शुक्ला, प्रकाशचंद सेठी कैबिनेट मे मिनिस्टर रह चुके थे.. 1975 में दोबारा सीएम बने श्यामाचरण ने ज़ब अपनी कैबिनेट में जगह नहीं दी तो अर्जुन सिंह ने उनकी जड़ें खोदनी शुरू कर दी.. एक फियेट खरीदकर दिल्ली मे मप्र भवन में ख़डी कर दी..इंदिरा गांधी तक पहुंच बढ़ाई.. सहारा बने गुरु डीपी मिश्रा…संजय गांधी से संबंध प्रगाढ़ किये और जैसे ही श्यामाचरण सरकार गयी.. जनता पार्टी की सरकार बनी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी दिल्ली से ले आये.. उनका अगला लक्ष्य सीएम की कुर्सी का था… इसके लिए उन्होंने अपनी चाणक्यबुद्धि का इस्तेमाल कर आदिवासी मुख्यमंत्री की आवाज़ उठवानी शुरू की.. आदिवासी विधायकों के कान में भरा कि सबसे अधिक आबादी आदिवासियों की…..सबसे अधिक विधायक आदिवासी।.. फिर बार -बार ब्राह्मण सीएम क्यों? सीएम कौन हो विधायक तय करें… आदिवासी कार्ड से शुक्ला बंधु किनारे हो गए… आदिवासी दावेदार बने शिवभानु सिंह सोलंकी, अर्जुन सिंह ने खुद दावेदारी की और तीसरे दावेदार हुए कुछ महीने पहले ही छिंदवाड़ा से सांसद चुने गए कमलनाथ… तय हुआ विधायक से वोटिंग कराई जाएगी.. जिसे ज्यादा वोट मिले वही सीएम..

 

 

 

 

दिल्ली से प्रणव मुखर्जी पर्यंवेक्षक बनकर आये. शिवभानु सोलंकी,..अर्जुन सिंह,और कमलनाथ के नाम लिखे तीन बक्से पीसीसी के एक कमरे मे रखे गए..विधायकों से गुत मतदान कराया गया.. लेकिन अर्जुन सिंह का दांव उल्टा पड़ता दिखने लगा.. आदिवासी विधायकों ने शिवभानु सोलंकी को एकतरफा वोट दिए ही अर्जुन सिंह के विरोधी भी उधर हो लिए… भारी गहमागहमी के बीच वोटों की गिनती शुरू ही होने वाले थी कि दिल्ली से एक फोन आया और गिनती कैंसिल कर दी गयी… कहा गया वोट दिल्ली में गिने जायेंगे… प्रणव मुखर्जी बक्से लेकर हवाई जहाज़ से दिल्ली चले गए…वहां से मैसेज आया कि अर्जुन सिंह सीएम होंगे… बताया गया कि कमलनाथ ने अपना समर्थन अर्जुन सिंह को दे दिया… कमलनाथ को मिले वोट भी अर्जुन सिंह के खाते में जोड़ दिए गए… अर्जुन सिंह, शिवभानु सोलंकी और कमलनाथ को कितने वोट मिले इसका कभी पता न चला… हां शिवभानु सिंह सोलंकी डिप्टी सीएम बना दिए गए..

 

 

 

 

डिप्टी सीएम पद के साथ शिवभानु को वित्त विभाग दिया गया था..पार्टी का निर्देश मान शिवभानु सोलंकी डिप्टी सीएम के पद पर मान तो गए लेकिन उनकी खीझ कभी नहीं गयी.. वो कहते थे कांग्रेस ने आदिवासी के सामने से परोसी थाली छीन ली..एक बार तत्कालीन जनसंपर्क संचालक सुदीप बनर्जी उनके पास अपने विभाग का बजट बढ़वाने के लिए गए तो सोलंकी ने उन्हें टका सा जवाब दे दिया। उन्होंने कहा- आप मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के अलावा करते ही क्या हैं?सोलंकी ने कहा..मप्र की आबादी 4 करोड़ है और प्रति व्यक्ति एक रुपये के हिसाब से आपके विभाग का बजट पर्याप्त है। उस समय जनसंपर्क विभाग का बजट करीब 4 करोड़ रुपये ही था।

 

 

 

शिवभानु सोलंकी 1985 का चुनाव भी जीते थे। उस समय मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उन्हें डिप्टी सीएम का पद नहीं दिया गया खैर मेन बात तो बताना भूल ही गए.. माना जाता है कि अर्जुन सिंह को पहली बार सीएम की कुर्सी संजय गांधी के निर्देश पर मिली लेकिन कहा ये जाता है कि इसके लिए संजय गांधी को भी किसी और का निर्देश था. ये निर्देश था संजय गांधी की सास अमृतेश्वर आनंद का.. बहुत कम. लोगों को मालूम होगा कि संजय गांधी की सास अमृतेश्वर आनंद उस समय कांग्रेस में इतनी प्रभावी थीं कि इंदिरा गांधी उनसे जलन रखने लगी थी.. उन्हें लग रहा था कि बेटा संजय सास के चककर में उनके हाथ से निकल गया.. उनके नहीं सास के निर्देश ज्यादा मानता हैँ.. इंदिरा गांधी उनके फोन तक टेप करा रही थी… इंदिरा और मेनका के बीच की दूरी की वजह भी मेनका की माँ ही थी.. कहते हैं संजय गांधी को साधने अर्जुन सिंह ने उनकी सास को अपने पाले में कर रखा था..

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