Mauganj MP:आबकारी की ‘मेहरबानी’ से फल-फूल रहा अरबों का अवैध शराब साम्राज्य, सरकार को भारी राजस्व का चूना!
रीवा/मऊगंज। विंध्य प्रदेश की ऐतिहासिक राजधानी रीवा और नवगठित मऊगंज जिला इन दिनों विकास की वजह से नहीं, बल्कि अवैध शराब (पाइकारी) के एक ऐसे समानांतर नेटवर्क के कारण चर्चा में हैं, जिसने सरकारी खजाने को खोखला कर दिया है। पुख्ता सूत्रों और जमीनी हकीकत पर गौर करें, तो आबकारी विभाग खुद शराब ठेकेदारों के हितैषी की भूमिका में नजर आ रहा है। टार्गेट पूरा करने और मोटी ड्यूटी फीस बचाने के चक्कर में दोनों जिलों में नियमों को ताक पर रखकर अवैध शराब का खेल जोरों पर है।
2000 से अधिक अवैध दुकानें, हजारों को मिला ‘काला रोजगार’
चौंकाने वाली जानकारी के मुताबिक, रीवा और मऊगंज जिले में इस समय लगभग 2000 से अधिक अवैध पाइकारी दुकानें धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं। कानून को ठेंगा दिखाकर चल रहे इस धंधे ने दोनों जिलों में हजारों बेरोजगारों को एक ‘अवैध रोजगार’ दे दिया है। इस नेटवर्क से जुड़े कारिंदे प्रतिदिन ₹2,000 से ₹3,000 तक की काली कमाई कर रहे हैं।
गढ़ और कटरा की कार्रवाई ने खोली पोल: ₹1600 की पेटी ₹3200 में खपाने का खेल
हाल ही में रीवा के गढ़ थाना क्षेत्र के कटरा में हुई आबकारी और पुलिस की कार्रवाई ने इस पूरे रैकेट के तौर-तरीकों को उजागर कर दिया है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, ड्यूटी फीस की चोरी कर रीवा जिले से मऊगंज जिले के नईगढ़ी और देवतालाब क्षेत्रों में शराब की तस्करी की जा रही है।
रीवा से महज ₹1,600 प्रति पेटी में खरीदी गई शराब को मऊगंज की अवैध पाइकारी दुकानों तक ₹3,000 से ₹3,200 में पहुंचाया जाता है। इस काम के लिए बकायदा दोपहिया और चार पहिया वाहनों की एक बड़ी फौज तैनात है।
यूपी की शराब से रीवा बेहाल: आधी कीमत पर ‘बेहतर’ गुणवत्ता
इस काले कारोबार का दूसरा सबसे बड़ा पहलू उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा होना है। मध्य प्रदेश (रीवा) में जो देसी मदिरा ₹1,600 प्रति पेटी मिलती है, वही शराब उत्तर प्रदेश में महज ₹800 प्रति पेटी में उपलब्ध है। स्थानीय मदिरा प्रेमियों के अनुसार, यूपी की शराब की गुणवत्ता भी एमपी से बेहतर है। इसी का फायदा उठाकर सीमा पार से तस्करी का बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है।
कमाई का गणित: एक फोर व्हीलर गाड़ी प्रतिदिन उत्तर प्रदेश का महज एक चक्कर लगाकर ₹50,000 से ₹60,000 कमाती है।
खर्च: डीजल और रास्ते के मैनेजमेंट में मात्र ₹10,000 से ₹15,000 का खर्च आता है।
नतीजा: प्रतिदिन ₹40,000 से ज्यादा का शुद्ध मुनाफा सीधे तस्करों की जेब में जा रहा है, जिससे सरकार के टैक्स और ड्यूटी की भारी चोरी हो रही है।
सफेदपोशों और ब्यूरोक्रेट्स की ‘काली कमाई’ का सुरक्षित ठिकाना
आखिर इस अवैध धंधे को इतनी मजबूती कहां से मिलती है? सूत्रों का दावा है कि इस व्यापार में सत्ता के करीबी सफेदपोश नेताओं और कुछ भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स (अधिकारियों) की काली कमाई लगी हुई है। चूंकि शराब ही एक ऐसा जरिया है जहां एक साल के भीतर पैसा दो से तीन गुना तक बढ़ जाता है, इसलिए बड़े पदों पर बैठे लोग पर्दे के पीछे से इस सिंडिकेट को संरक्षण दे रहे हैं। इन शराब माफियाओं की आय इतनी अधिक है कि इसका कोई लेखा-जोखा इनकम टैक्स विभाग के पास भी नहीं है।
दिखावे की कार्रवाई: ‘सोर्स’ तक क्यों नहीं पहुंचती आबकारी पुलिस?
इस पूरे मामले में आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। विभाग द्वारा की जाने वाली अधिकांश कार्रवाइयां महज औपचारिकता और ‘दिखावा’ प्रतीत होती हैं।
भेदभावपूर्ण कार्रवाई: रास्ते में या पाइकारी दुकान पर शराब पकड़कर केस दर्ज कर लेना, विभाग की नियति बन चुका है।
मुख्य सवाल: आज तक आबकारी विभाग ने यह जांच करने की जहमत नहीं उठाई कि पकड़ी गई शराब आखिर किस दुकान से निकली थी? किस गोदाम से उठी थी और किस कंपनी की थी?
तकनीकी अनदेखी: शराब की बोतलों पर दर्ज बैच नंबर और बारकोड से यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि यह माल किस ठेकेदार का है, लेकिन बड़े मगरमच्छों को बचाने के लिए आबकारी पुलिस कभी ‘सोर्स’ (उद्गम स्थल) तक नहीं जाती। इससे पहले ‘मैग्मा’ में पकड़ी गई शराब के दौरान भी ऐसा ही बवाल हुआ था, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
रीवा और मऊगंज में चल रहा यह अवैध शराब का खेल अब केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है। यदि सरकार ने समय रहते आबकारी विभाग के इस कथित ‘शरणम गच्छामि’ रवैये पर लगाम नहीं कसी, तो राज्य को हर साल अरबों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा और कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।





