🕒 Updated: 19 Jun 2026, 03:48 AM
Mauganj MP:मऊगंज शर्मसार: जिस पर लगा छात्राओं से अभद्रता का आरोप, प्रशासन ने उसी को फिर बना दिया हॉस्टल का ‘रक्षक’!
जांच में दोषी, नीयत में खोट, फिर भी मेहरबान है प्रशासन; क्या रसूख के आगे दब गई बेटियों की चीख?
बेटियों ने कहा- ‘वो गलत तरीके से छूते थे’, जांच अधिकारी ने माना दोषी, फिर भी बहाल हो गया मनोज पटेल!
सिस्टम की बेशर्मी: सस्पेंशन से बहाली तक का खेल, क्या जिला संयोजक दे रहे हैं दोषी को संरक्षण?
मऊगंज।आज हम बात कर रहे हैं न्याय के उस कत्ल की, जो फाइलों के बीच मऊगंज के प्रशासनिक गलियारों में किया गया है। कल्पना कीजिए, एक ऐसा शख्स जिस पर आदिवासी महिलाएं अभद्रता का आरोप लगाएं, जिस पर मासूम बच्चियां गवाही दें कि वह उनके नहाते वक्त हॉस्टल में घुस आता था, और जिस पर भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत हों… उसे सजा मिलनी चाहिए या ईनाम? आप कहेंगे सजा, लेकिन मऊगंज जिला संयोजक ने उसे ईनाम में तीन-तीन छात्रावासों की जिम्मेदारी सौंप दी है।
मामला 16 सितंबर 2025 से शुरू होता है। मनोज पटेल, जो प्रभारी मंडल संयोजक था, उसके खिलाफ सुकवरिया कोल, पूनम कोल और इंद्रा मिश्रा जैसी वार्डन ने मोर्चा खोला। आरोप ऐसे कि रूह कांप जाए। जातिसूचक गालियां, एक लाख रुपये की रिश्वत की मांग और सबसे घिनौना आरोप—कन्या छात्रावास में नियमों को ताक पर रखकर रात-बेरात घुसपैठ।
आपको बता दे कि रीवा कमिश्नर के आदेश पर जांच हुई। अनुविभागीय अधिकारी (SDM) की जांच रिपोर्ट में जो खुलासे हुए, वो सिस्टम के मुंह पर तमाचा हैं। छात्राओं ने बयान दिया कि मनोज पटेल सुबह /शाम 6 बजे हॉस्टल में घुस आता था। मासूम बच्चियों ने कहा— जब हम नहाते थे, तब वो आ जाता था, हमें पानी की टंकी के पीछे छुपना पड़ता था। छात्राओं ने बताया कि वह उनके कंधों पर हाथ रखता था, उनके कपड़ों के वीडियो बनाता था और वार्डन को बाहर जाने को कहता था।
SDM की जांच में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सही पाया गया। रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि मनोज पटेल का कृत्य घोर निंदनीय’ है और उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए। लेकिन साहब! ये मध्य प्रदेश का प्रशासन है, यहाँ फाइलें घूमती हैं और गुनाहगार मुस्कुराते हैं।
और 6 फरवरी 2026 को एक ऐसा पत्र जारी होता है जो न्याय की उम्मीद पर कालिख पोत देता है। जिस व्यक्ति के ऊपर आरोप सिद्ध है और उस पर कार्यवाही होनी चाहिए थी, उसे बहाल कर दिया गया। इतना ही नहीं, जिला संयोजक ने उसे फिर से तीन बालक छात्रावासों का अधीक्षक बना दिया। सवाल ये है कि क्या प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है? क्या मासूम बच्चों का भविष्य उस व्यक्ति के हाथ में सुरक्षित है जिसे जांच में ही ‘अमर्यादित’ और ‘दोषी’ माना जा चुका है?





