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Delhi news:₹10-20 के नोटों में बड़ा बदलाव! जेब में रहेगा वही साइज, लेकिन मटेरियल होगा नया!

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🕒 Updated: 03 Nov 2026, 08:32 AM

Delhi news:₹10-20 के नोटों में बड़ा बदलाव! जेब में रहेगा वही साइज, लेकिन मटेरियल होगा नया!

 

 

 

 

RBI की नई तैयारी से बदल सकती है छोटी करेंसी की तस्वीर, पॉलीमर नोटों का होगा पायलट प्रोजेक्ट

नई दिल्ली। देश में रोजमर्रा के लेनदेन में इस्तेमाल होने वाले ₹10 और ₹20 के नोटों को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, RBI छोटे मूल्यवर्ग की करेंसी को ज्यादा टिकाऊ बनाने के लिए पॉलीमर यानी प्लास्टिक से बने नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।

प्रस्तावित योजना के तहत शुरुआती परीक्षण ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोटों पर किया जा सकता है। सबसे खास बात यह है कि इन नए नोटों का आकार मौजूदा नोटों के समान रखने की तैयारी है। यानी नोट का मटेरियल बदल सकता है, लेकिन जेब में रखने पर उसका साइज वही रहेगा।

 

 

 

 

1 अप्रैल 2027 से शुरू हो सकता है ट्रायल

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट 1 अप्रैल 2027 के आसपास शुरू होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम समयसीमा और व्यापक स्तर पर इन नोटों को जारी करने का निर्णय RBI के परीक्षण और प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

RBI की इस पहल का उद्देश्य छोटी करेंसी को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाना है। ₹10 और ₹20 के नोट लगातार हाथ बदलते रहते हैं, जिसके कारण वे अपेक्षाकृत जल्दी गंदे, मुड़े और खराब हो जाते हैं।

 

 

 

 

नोट का साइज क्यों नहीं बदलेगा?

पॉलीमर नोटों का आकार अगर मौजूदा कागजी नोटों से अलग हुआ तो इसका असर सिर्फ जनता की जेब पर नहीं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम पर भी पड़ सकता है।

ATM मशीनों में अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट रखने के लिए विशेष कैसेट होते हैं। नोट का आकार बदलने पर इन मशीनों में तकनीकी बदलाव और री-कैलिब्रेशन की जरूरत पड़ सकती है। इससे बैंकों और ATM ऑपरेटरों पर बड़ा अतिरिक्त खर्च आ सकता है।

इसी वजह से प्रस्तावित पॉलीमर नोटों का आकार मौजूदा नोटों के अनुरूप रखने की तैयारी की जा रही है, ताकि बड़े पैमाने पर ATM मशीनों में बदलाव की आवश्यकता कम हो।

 

 

 

 

नोटबंदी के समय भी आया था ATM री-कैलिब्रेशन का खर्च

ATM में नोटों के आकार का महत्व समझने के लिए वर्ष 2016 की नोटबंदी का उदाहरण दिया जाता है। 8 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार ने ₹500 और ₹1,000 के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने की घोषणा की थी। इसके बाद अलग-अलग आकार के नए नोट जारी किए गए।

नए नोटों के आकार के अनुरूप ATM मशीनों को री-कैलिब्रेट करने में बैंकिंग और ATM उद्योग को बड़ा खर्च उठाना पड़ा था।

रिपोर्ट्स में एक उदाहरण के तौर पर बताया गया है कि यदि किसी बैंक के पास 8,500 ATM हों और प्रत्येक मशीन के री-कैलिब्रेशन का औसत खर्च ₹2.5 लाख माना जाए, तो अकेले उस बैंक का खर्च करीब ₹21.25 करोड़ तक पहुंच सकता है।

 

 

 

 

आखिर क्या होते हैं पॉलीमर नोट?

पॉलीमर नोट विशेष प्लास्टिक आधारित सामग्री से तैयार किए जाते हैं। सामान्य कागजी नोटों की तुलना में इन्हें अधिक टिकाऊ माना जाता है।

इनमें पानी, नमी और सामान्य इस्तेमाल से होने वाली क्षति का प्रतिरोध अधिक हो सकता है। इसके चलते ऐसे नोट लंबे समय तक चल सकते हैं और बार-बार बदलने की जरूरत कम हो सकती है।

 

 

 

 

RBI को क्या फायदा होगा?

अगर पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है और भविष्य में पॉलीमर नोट बड़े पैमाने पर अपनाए जाते हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा करेंसी मैनेजमेंट में देखने को मिल सकता है।

छोटे मूल्यवर्ग के नोट बड़ी संख्या में इस्तेमाल होते हैं और तेजी से खराब भी होते हैं। ऐसे में अधिक टिकाऊ नोटों के इस्तेमाल से पुराने नोटों को बार-बार बदलने और वापस लेने की जरूरत कम हो सकती है।

इससे लंबे समय में नोटों के प्रबंधन और प्रतिस्थापन की लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

 

 

 

 

नकली नोटों पर भी लग सकता है अंकुश

पॉलीमर नोटों में आधुनिक सुरक्षा फीचर शामिल किए जा सकते हैं। पारदर्शी विंडो और अन्य सुरक्षा विशेषताओं जैसे फीचर्स के जरिए नकली नोटों की पहचान को बेहतर बनाने की संभावना रहती है।

दुनिया के कई देशों में पॉलीमर करेंसी का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है। ऐसे में भारत में भी इसके संभावित फायदे और व्यवहारिक चुनौतियों का आकलन पायलट प्रोजेक्ट के दौरान किया जा सकता है।

 

 

 

 

फिलहाल कागज से प्लास्टिक की ओर सिर्फ परीक्षण की तैयारी

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि पायलट प्रोजेक्ट का मतलब तत्काल सभी ₹10 और ₹20 के नोटों को प्लास्टिक के नोटों से बदल देना नहीं है। पहले सीमित स्तर पर परीक्षण किया जाएगा। इसके परिणामों के आधार पर ही आगे की रणनीति तय होगी।

अगर प्रयोग सफल रहा, तो आने वाले वर्षों में भारतीय करेंसी सिस्टम में पॉलीमर नोटों की हिस्सेदारी बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।

 

 

 

यानी जेब में नोट का आकार वही रह सकता है, लेकिन उसकी मजबूती और तकनीक में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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